इस्लाम और प्रतिभा की पहचान

मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी

✍️ मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी (निदेशक: अल-ग़ज़ाली इंटरनेशनल स्कूल (जीआईएस), अररिया, बिहार)

यह अल्लाह की सुन्नत (परंपरा) है कि वह अपने बंदों को अलग-अलग क्षमताओं और गुणों से सजाता है, ताकि वे दुनिया में अपनी एक अनोखी पहचान बना सकें और अपनी क़ाबिलियत (प्रतिभा) के ज़रिए दूसरों के लिए लाभ का माध्यम बनें। इंसान की यही विशेषताएँ उसकी असली सम्पत्ति और महत्त्व हैं, जो अल्लाह की अता (अनुकम्पा) से जुड़ी हैं। इन्हीं के ज़रिए वह अपनी दुनियावी और उख़रवी (परलोक की) सफलता प्राप्त करता है।

इस सुन्नत-ए-इलाही (ईश्वरी परंपरा) की सबसे रोशन मिसाल (उज्ज्वल उदाहरण) नबी-ए-अकरम ﷺ की ज़ात-ए-अकदस (पवित्र व्यक्तित्व) है। अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने आपको अनगिनत सिफ़ात (गुणों) और कमालात (श्रेष्ठताओं) से नवाज़ा और फिर क़ुरआन मजीद (पवित्र क़ुरआन) में आपकी महानता और गरिमा को बयान करके आपकी प्रशंसा की।

क़ुरआन में आपके अख़लाक़ (चरित्र) को “अज़ीम (महान)” कहा गया, आपको “रहमत-उल-लिल-आलमीन (सारे संसार के लिए दया का स्रोत)” बताया गया, और आपकी इता‘अत (आज्ञापालन) को अल्लाह की इताअत के बराबर ठहराया गया।

यहाँ से यह हक़ीक़त हमारे सामने आती है कि जब ख़ालिक़-ए-कायनात (सृष्टिकर्ता) खुद अपने किसी बंदे (मनुष्य) को गुणों और अच्छाइयों से नवाज़ता है और उसकी प्रशंसा करता है, तो यह इंसानों के लिए एक अबदी सबक़ (हमेशा रहने वाली शिक्षा) है कि वे भी एक-दूसरे की क़ाबिलियत (प्रतिभा) को पहचानें, सराहें और हौसला-अफ़ज़ाई (प्रोत्साहन) करें। किसी व्यक्ति की अच्छाई या उसके हुनर को स्वीकार करना और उसकी प्रशंसा दरअसल अल्लाह की उस नेमत (वरदान) को स्वीकार करना है जो उसने अपने बंदे को दी है। यानि उस व्यक्ति की तारीफ़ करना सिर्फ़ उसकी नहीं, बल्कि अल्लाह की दी हुई इनायत (कृपा) की भी पहचान है।

नबी-ए-अकरम ﷺ ने इसी नहज (सिद्धांत) पर अपने सहाबा-ए-किराम (रज़ि.अ.) की तर्बियत (शिक्षा और प्रशिक्षण) की कि जिस सहाबी (साथी) में जो खूबी (गुण) और ख़ासियत (विशेषता) थी, आपने ﷺ न केवल उसे सराहा बल्कि उसकी प्रोत्साहन की और फिर उसी क्षमता के अनुसार उससे काम लिया जैसे कि हज़रत अबु बक्र सिद्दीक़ रजी. के इख़लास (सच्चाई) और त्याग को उजागर किया और उन्हें उम्मत का सबसे भरोसेमंद व्यक्ति बताया, यहाँ तक मक्का से हिजरत (प्रवास) के वक़्त ग़ार-ए-सौर में पनाह ली, तो साथ रहने के लिए उन्हें ही चुना। हज़रत उमर रजी. की असाधारण साहस और वीरता को देखकर आपने दुआ की

اللَّهُمَّ أَعِزَّ الإِسْلاَمَ بِأَحَبِّ هَذَيْنِ الرَّجُلَيْنِ إِلَيْكَ، بِأَبِي جَهْلٍ، أَوْ بِعُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ (صحيح البخاري، حديث نمبر: 3681)

“ऐ अल्लाह! इन दो आदमियों में से, जो तुझे ज़्यादा पसंद (प्रिय) है — अबू जहल या उमर बिन ख़त्ताब — उसके माध्यम इस्लाम को सम्मान और शक्ति प्रदान कर।” अल्लाह तआला ने यह दुआ हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) के हक़ में क़बूल (स्वीकार) फरमाई। और बाद में उनकी क़ूवत-ए-फ़ैसला (निर्णय लेने की शक्ति) और अदल (न्यायप्रियता) को उम्मत के लिए एक सर्माया (अमूल्य धरोहर) बना दिया। इसी तरह हज़रत उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) की सख़ावत (उदारता) को उम्मत के सामने उजागर किया,
जब उन्होंने “बीर-ए-रूमा” नाम का कुआँ अल्लाह की राह में वक़्फ़ (दान) कर दिया।(सीरत इब्न हिशाम) हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) के ज्ञान और समझ को सराहते हुए नबी ﷺ ने फ़रमाया — أَنَا مَدِينَةُ الْعِلْمِ وَعَلِيٌّ بَابُهَا “मैं इल्म का शहर हूँ और अली उसका दरवाज़ा हैं।” (मुसतदरिक-ए-हाकिम) हज़रत ख़ालिद बिन वलीद रजी. के बारे में ऐलान फ़रमाया — إِنَّهُ سَيْفٌ مِنْ سُيُوفِ اللَّهِ “यह अल्लाह की तलवार है।” (बुख़ारी) और जिहाद व मआरका (युद्ध) के मैदान उनके सुपुर्द किए। इसी तरह हज़रत अबू उबैदा रजी. को “उम्मत का अमीन (विश्वसनीय व्यक्ति)” कहा। (सीरत इब्न हिशाम)

قَالَ النَّبِيُّ ﷺ:إِنَّ لِكُلِّ أُمَّةٍ أَمِينًا، وَأَمِينُ هَذِهِ الْأُمَّةِ أَبُو عُبَيْدَةَ بْنُ الْجَرَّاحِ

नबी ﷺ ने फ़रमाया — “हर उम्मत का एक अमीन (विश्वसनीय व्यक्ति) होता है, और इस उम्मत का अमीन अबू उबैदा बिन जर्राह हैं।” हज़रत मुआज़ बिन जबल रजी. को “हलाल और हराम का सबसे बड़ा आलिम (विद्वान)” क़रार दिया। (तारीख़-ए-तबरी) और हज़रत बिलाल रजी. की अज़ान को दीन (इस्लाम) की पहचान बना दिया। (सीरत इब्न हिशाम)

ये सभी उदाहरण बताते हैं कि नबी ﷺ की तर्बियत (शिक्षा और प्रशिक्षण) का एक बड़ा उसूल (सिद्धांत) यह था कि हर व्यक्ति कि हर सहाबी (साथी) की खूबी को पहचाना जाए, उसे न सिर्फ़ स्वीकार किया जाए बल्कि उम्मत (समाज) की सेवा और दीन (धर्म) की बुलंदी के लिए उसे सही दिशा में इस्तेमाल भी किया जाए।

दुखद बात यह है कि आज की उम्मत (मुस्लिम समाज) अपनी असली ताक़त को पहचानने में नाकाम (असफल) है जबकि यही ताक़त (शक्ति) उसके भीतर मौजूद अनेकों प्रतिभाशाली व्यक्तियों की शक्ल में है। इतिहास का यह क़ायदा (नियम) है कि जब किसी क़ौम (समुदाय) के अहल-ए-इल्म (बुद्धिजीवियों) और अस्हाब-ए-हुनर (कुशल व्यक्ति) को उनकी क़ाबिलियत (योग्यता) के अनुसार सम्मान नहीं दी जाती, तो वे या तो मायूसी (निराशा) और गुमनामी (अज्ञातता) का शिकार हो जाते हैं या ग़ैर-ज़रूरी कामों में बर्बाद हो जाते हैं। असल में समाज की विकास व्यक्ति की इनफ़िरादियत (विशेषता) से होती है। जब यही गुण दबा दिए जाते हैं, तो समाज जमूद (स्थिरता) और ज़वाल (पतन) का शिकार हो जाता है।

आज हमारा दुर्भाग्य यही है कि उम्मत (समाज) के बड़े हिस्से ने अपने इन रोशन-दिमाग़ों (उज्ज्वल मस्तिष्कों) के लिए न तो कोई प्रोत्साहन का प्रणाली की व्यवस्था किया है, और न ही उनके लिए ऐसा प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध कराया है जहाँ वे अपनी ख़ुदादाद (ईश्वर-प्रदत्त) क्षमताओं को उम्मत की निर्माण और विकास के लिए उपयोग कर सकें। यही वजह है कि हमारे पास इस्तिदाद (योग्यता) तो है, लेकिन कारकर्दगी (प्रदर्शन) नहीं; ज्ञान तो है, लेकिन अमल (कार्यान्वयन) नहीं; अफ़राद (व्यक्ति) तो हैं, मगर क़ियादत (नेतृत्व) का अभाव है। आख़िरकार यही कमी उम्मत (समाज) को सोच और अमल — दोनों स्तरों पर ऐसे संकट में डाल देती है, जिससे निकलने में सदियाँ लग जाती हैं।

इस से भी अधिक दुखद पहलू यह है कि समुदाय में एक ऐसा वर्ग भी मौजूद है जो योग्य और प्रतिभाशाली लोगों की प्रशंसा करने के बजाय उनके मनोबल गिराने और उनके रास्ते रोकने में व्यस्त रहता है। ऐसे लोग सकारात्मक विचार के बजाय हसद (ईर्ष्या), तअस्सुब (पक्षपात) और तंग-नज़री (संकीर्णता) का शिकार होते हैं। जब कोई शख़्स (व्यक्ति) अपने ज्ञान, योग्यता या तख़लीक़ी हुनर (रचनात्मक क्षमता) के द्वारा आगे बढ़ता है और समाज के लिए कोई लाभदायक सेवा अंजाम देना चाहता है, तो यह वर्ग बजाय इसके कि उसका हाथ थाम कर उसे और आगे बढ़ने का मौक़ा दे उल्टा उसकी कमज़ोरियों को उछालता है, उसकी इरादा पर संदेह करता है और उसकी सफलता को कम करने की कोशिश करता है। यह व्यवहार दरअसल इस बात की निशानी है कि हम सामूहिक रूप से अपनी असली विकास की राह में खुद रुकावट बने हुए हैं। उदाहरण के तौर पर अगर किसी इलाक़े में कोई नौजवान अपनी इल्मी मेहनत (बौद्धिक परिश्रम) या सामाजिक सेवाओं के ज़रिए प्रसिद्ध होता है, तो बजाय इसके कि उसकी प्रोत्साहन की जाए कुछ लोग यह कहते नज़र आते हैं: “यह तो शोहरत (प्रसिद्धि) के पीछे है” या “यह अपनी बड़ाई जताना चाहता है।” इसका परिणाम यह होता है कि वह नौजवान या तो निराश होकर अपनी रफ़्तार धीमी कर देता है, या फिर पूरी तरह ख़ामोश हो जाता है और इस तरह समाज अपनी एक अनमोल पूँजी खो बैठता है। वास्तविकता यह है कि यह रवैया न केवल आम लोगों के लिए हानिकारक है, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक शक्ति को भी धीरे-धीरे ज़वाल (पतन) की ओर धकेल देता है। क्योंकि किसी समुदाय का विकास हमेशा योग्य व्यक्तियों के सम्मान और उनके लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने पर निर्भर करता है।

आख़िर में यह सोचना हम सब के लिए अनिवार्य है कि समाज का भविष्य उन्हीं योग्य व्यक्तियों पर निर्भर करता है, जिन्हें आज हम या तो अनदेखा कर रहे हैं या उनकी राहों में काँटे बिछा रहे हैं। अगर हमने सुन्नत-ए-नबवी (नबी ﷺ की परंपरा) की रौशनी में उन्हें पहचाना, उनका हौसला बढ़ाया, और उनके लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया, तो यही लोग हमारी समुदाय के पतन को उन्नति में बदल सकते हैं। लेकिन अगर हमने अपनी बे-हिसी (उदासीनता) और तंग-नज़री (संकीर्णता) पर अडिग (ज़िद्दी) रहे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें दोषी ठहराएँगी और इतिहास हमें कभी क्षमा नहीं करेगा कि हमारे पास अनमोल रत्न मौजूद थे, मगर हमने उन्हें व्यर्थ कर दिया। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम हसद (ईर्ष्या) और तंग-दिली (संकीर्ण सोच) के बजाय इख़लास (सच्चाई) और दिल की विशालता को अपनाएँ। योग्य व्यक्तियों की सम्मान और आदर करें, और उनके साथ खड़े होकर समाज की नशात-ए-सानिया (पुनर्जागरण) की बुनियाद रखें क्योंकि यह मात्र व्यक्तियों की नहीं, बल्कि पूरी समुदाय की अस्तित्व और विकास का सवाल है।

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