
मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी
(निदेशक: अल-ग़ज़ाली इंटरनेशनल स्कूल (जीआईएस), अररिया, बिहार)
ग़लती मनुष्य के अस्तित्व का वह अनिवार्य पहलू है जो उसकी अपूर्ण बुद्धि और सीमित समझ का प्रतीक है। उसकी रचना ही इस ढंग से हुई है कि उसके चेतन में पूर्णता की खोज तो रखी गई, किंतु उस तक पहुँचने की क्षमता को स्वतंत्र इच्छा के रूप में सौंपा गया जहाँ भूल और चूक की संभावना सदा बनी रहती है। पर यही चूक उसे विचार, पश्चाताप और तौबा (सच्चे मन से अल्लाह की ओर लौटने) के मार्ग पर ले जाती है, जो अंततः उसे आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करती है। यानी ग़लती केवल मनुष्य की कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसके अर्थपूर्ण अस्तित्व का प्रमाण भी है। क्योंकि यदि ग़लती की संभावना न होती, तो तौबा की महानता और मग़फ़िरत (ईश्वरीय क्षमा) की असीम विशालता भी प्रकट न होती। नबी-ए-करीम ﷺ ने मनुष्य की इसी स्वाभाविक प्रवृत्ति को इस ख़ूबसूरत अंदाज़ में बयान फरमाया:
“كُلُّ ابْنِ آدَمَ خَطَّاءٌ وَخَيْرُ الْخَطَّائِينَ التَّوَّابُونَ”
“हर इंसान (संभावित रूप से) ग़लती करने वाला है, और सबसे उत्तम ग़लती करने वाले वे हैं जो तौबा करने वाले हैं।” (तिरमिज़ी, हदीस नं. 2499)
यही कारण है कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अपनी पूर्ण हिकमत (ज्ञान और विवेक) से इस्लामी शरीअत को इस तरह व्यवस्थित किया कि वह न केवल मानवीय कमज़ोरियों का गहरा अहसास रखती है, बल्कि उनकी भरपाई के लिए सुव्यवस्थित, न्यायपूर्ण और दया से भरा हुआ तंत्र भी प्रदान करती है। चूंकि इंसान से ग़लती का होना अनिवार्य है, इसलिए शरीअत ने केवल सज़ा ही नहीं बताई, बल्कि इस्लाह (सुधार), तौबा (पश्चाताप), कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) और मग़फ़िरत (क्षमा) के नियम भी निर्धारित किए ताकि सामाजिक संतुलन भी बना रहे और आध्यात्मिक पवित्रता भी सुरक्षित रहे। यदि शरीअत में सुधार के दरवाज़े बंद होते, तो इंसान निराशा और विद्रोह का शिकार हो जाता। लेकिन इस्लाम ने उसे उम्मीद, रुजू (पलटने), सुधार और बेहतरी का रोशन मार्ग दिखाया। इस प्रकार शरीअत-ए-मुहम्मदिया इंसान के ग़लती करने के बावजूद उसकी इज़्ज़त और गरिमा को सलामत रखती है, और उसे पछतावे (पश्चाताप) के ज़रिए आध्यात्मिक उन्नति की बुलंद मंज़िलों तक पहुँचने का अमूल्य अवसर प्रदान करती है।
अल्लाह तआला ने पवित्र कुरान में तौबा की महिमा को बहुत सुंदर और प्रभावशाली ढंग से बयान किया है:
اِنَّ اللّـٰهَ يُحِبُّ التَّوَّابِيْنَ وَيُحِبُّ الْمُتَطَهِّرِيْنَ
“निश्चय ही अल्लाह तौबा करने वालों से प्रेम करता है और पवित्र रहने वालों को पसंद करता है।” (सूरह अल-बकरह: 222)
इस पवित्र आयत से स्पष्ट होता है कि तौबा केवल पाप से मुक्ति का साधन नहीं, बल्कि अल्लाह की प्रेम प्राप्ति का सच्चा मार्ग है। क्योंकि तौबा इंसान के अंदर पछतावा, ख़ुद एहतिसाब (आत्म-निरीक्षण) और इस्लाह-ए-नफ़्स (आत्म-सुधार) की भावना जगाती है जो उसे पाप के अंधकार से पुण्य के प्रकाश की ओर ले जाती है। वास्तव में यह इंसान और उसके सृष्टिकर्ता के बीच एक गहरा आध्यात्मिक संबंध है, जो बंदगी का एहसास को ताज़ा करता है, और दिल में उम्मीद और शांति की लहरें भर देता है।
यहाँ यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इस्लाम इंसान का मूल्यांकन उसके अतीत की ग़लतियों से नहीं, बल्कि उसकी नीयत, तौबा और वर्तमान सुधार (इस्लाह-ए-हाल) से करता है। जब कोई इंसान अपनी ग़लती के बाद भरपाई (तलाफ़ी) करता है और सच्चे दिल से अल्लाह की ओर लौटता है (रुजू इलल्लाह), तो वह अपनी रूह को उस गंदगी और मैल से पाक कर लेता है जो गुनाह ने उस पर डाल दी थी। इस दृष्टि से देखा जाए तो इंसान कोई स्थिर प्राणी नहीं, बल्कि गतिशील और उन्नतिशील अस्तित्व है जो गिरता ज़रूर है, मगर संभलता भी है; भटकता ज़रूर है, मगर राह पा भी लेता है। इसलिए इस्लाम इंसान को ग़लती के घेरे में कैद नहीं करता, बल्कि तौबा के ज़रिए उसे शाश्वत (अनंत) पवित्रता के मार्ग पर चला देता है। इसकी सबसे उत्तम उदाहरण यह है कि अगर कोई ग़ैर-मुस्लिम ईमान लाकर इस्लाम स्वीकार कर लेता है, तो उसके सारे पिछले गुनाह और ग़लतियाँ मिटा दी जाती हैं।
नबी-ए-अकरम ﷺ ने फ़रमाया: “इस्लाम (क़ुबूल करना) पहले के तमाम गुनाहों को मिटा देता है।” (मुस्लिम:121)
इस हदीस का अर्थ यह है कि ईमान लाने के बाद इंसान एक नई रूहानी ज़िंदगी में प्रवेश करता है जहाँ बीता हुआ अतीत मिट जाता है और एक पवित्र व उज्ज्वल अस्तित्व की नींव रखी जाती है। यह दृष्टिकोण इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि इस्लाम इंसान को अतीत के बोझ से मुक्त करके उम्मीद, सुधार और नई शुरुआत का अनमोल अवसर प्रदान करता है।
चर्चा के संदर्भ में एक कड़वी सच्चाई हमारे सामने आती है कि जहाँ इस्लाम तौबा के बाद इंसान को बिल्कुल साफ़ और निष्पाप मानता है, वहीं समाज अक्सर ऐसा नहीं करता। इंसानों की नज़र छोटी और फैसले सतही होते हैं, इसलिए वे किसी व्यक्ति की अतीत की ग़लतियों को भूल नहीं पाते। परिणामस्वरूप, वह व्यक्ति जिसने सच्चे मन से खुद को सुधार लिया और तौबा से रूहानी (आत्मिक) पवित्रता प्राप्त कर ली, वह भी कुछ लोगों की नज़र में हमेशा अपराधी ही बना रहता है। यह रवैया वास्तव में मानवीय कम-समझ और दिल की संकीर्णता का नमूना है, क्योंकि इस्लाम सिखाता है कि “जो व्यक्ति तौबा कर ले, वह ऐसा है जैसे उसने कभी गुनाह किया ही नहीं।” मगर दुख की बात है कि इंसान अल्लाह जैसा माफ़ करने वाला नहीं बनता; वह दूसरों के अतीत को उनकी पहचान बना देता है। यही वह बिंदु है जहाँ अल्लाह का न्याय और मानवीय सोच में सबसे बड़ा अंतर उजागर होता है।
याद रखिए! किसी व्यक्ति की तौबा (सच्चे पश्चाताप) के बाद भी उसे उसके अतीत की ग़लतियों के ताने देना या बार-बार उसकी ख़ता की याद दिलाना केवल नैतिक कमजोरी नहीं, बल्कि एक जवाबदेह (क़ाबिल-ए-मुआख़ज़ा) पाप है। यह काम इंसान के दिल से दया, न्याय और निष्पक्षता के भाव को छीन लेता है और समाज में बिगाड़ और नफ़रत का बीज बो देता है। जो व्यक्ति अल्लाह के माफ़ किए हुए बंदे को माफ़ नहीं करता, वह वास्तव में इलाही मग़फ़िरत (ईश्वरीय क्षमा) के प्रणाली से बग़ावत (विद्रोह) करता है। ऐसे व्यवहार का नुकसान केवल दुनिया में ही नहीं, बल्कि आख़िरत (परलोक) में भी भुगतना पड़ सकता है। इसलिए, हमारा यह पवित्र और नैतिक कर्तव्य है कि जब कोई इंसान सच्चे दिल से तौबा करे और अपनी पुरानी भूल को दोहराने से बच जाए, तो हम उसे सम्मान, भरोसे और स्नेह के साथ स्वीकार करें ताकि इस धरती पर मोहब्बत, अपनत्व और इंसानियत की भावना को बढ़ावा मिले, और समाज में रहमत और माफी की खुशबू फैल जाए।
