आज के दौर की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक यह है कि समाज की बुनियादी सोच ही बदल दी गई है। अच्छाई को बुराई और बुराई को अच्छाई के रूप में पेश किया जाने लगा है। “आधुनिकता, आज़ादी और बराबरी” जैसे नारों के नाम पर आज की नई पीढ़ी ऐसे कामों में पड़ चुकी है जिनकी कल्पना भी पहले सभ्य समाज में नहीं की जा सकती थी। अब वही काम “फैशन और कल्चर” का हिस्सा समझे जाने लगे हैं। और जो लोग इनके खिलाफ आवाज़ उठाते हैं, उन्हें “पुराना ख़याल” या “पिछड़ा” कहकर मज़ाक बनाया जाता है।
इस नई तहज़ीब ने जहां बहुत कुछ बर्बाद किया है, वहीं इसने औरत की सबसे कीमती पूंजी — इफ़्फ़त और अस्मत (पवित्रता और चरित्र) — को सस्ते दामों पर बेच दिया है। जो चीज़ औरत का असली गहना थी, वह अब उसकी नज़रों में भी अपनी अहमियत खो चुकी है।
एक दौर था जब नाचने-गाने वालों को समाज का कलंक माना जाता था। उनकी कोठियाँ भले ही रौनक से भरी रहती थीं, उनकी ज़िंदगी भले ही शाही अंदाज़ की होती थी, और उनके कपड़े भले ही बेहतरीन होते थे, लेकिन समाज में उनकी हैसियत इतनी गिर चुकी थी कि कोई शरीफ़ घराना उनसे शादी-ब्याह या रिश्तेदारी जोड़ना गवारा नहीं करता था। इसकी वजह साफ़ थी — उनका पेशा सभ्य समाज की नज़रों में नापसंद और अस्वीकार्य था। हर कोई जानता था कि यह पेशा समाज की तहज़ीब और संस्कृति पर एक बदनुमा दाग़ है। औरत की इज़्ज़त, पवित्रता और चरित्र जैसी चीज़ों का उन कोठियों में कोई नाम-ओ-निशान नहीं था।
लेकिन वक्त बदला, हालात बदले और समाज की सोच भी बदल गई। शब्दावली बदली, नज़रिए बदले और जो चीज़ कभी गुनाह और गंदगी समझी जाती थी, वही अब कला और शिक्षा कहलाने लगी। बाक़ायदा संस्थान बने, विशेषज्ञ तैयार किए गए और धीरे-धीरे यह स्थिति आ गई कि शरीफ़ घरानों की बेटियाँ भी इस “कला” को सीखना अपने लिए इज़्ज़त और फ़ख़्र की बात समझने लगीं।
जब समाज की बहुएँ-बेटियाँ घर की दहलीज़ से बाहर निकलने लगीं, फैशन और कला के नाम पर अजनबियों से बेहिचक मेलजोल बढ़ने लगा, और उनके तन-मन की हर अदा गैरों के इशारों पर ढलने लगी, तब सबसे पहले लज्जा और मर्यादा की प्रतिमा चूर-चूर हुई। हँसी-ठट्ठा और दिल बहलाने की महफ़िलें सजने लगीं, अपनों और परायों के बीच की सीमाएँ टूट गईं।
नतीजा यह हुआ कि वे तमाम तौर-तरीके और आदतें, जो कभी जुए के अड्डों और वेश्याओं की पहचान थीं, वही अब शरीफ़ घरानों की बेटियों में उतर आईं। जो खाई और दूरी उनके और उन औरतों के बीच थी, उसे तथाकथित कला के नाम पर भर दिया गया। पवित्रता और चरित्र की चादर उतार फेंकी गई। जो कल तक समाज की नज़र में अभिशाप और कलंक माने जाते थे, वही आज समाज की शान और उसकी पहचान बना दिए गए।नई सभ्यता और संस्कृति की इस लहर ने केवल पुरानी सभ्यताओं और संस्कृतियों को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि धर्म भी इसकी आंच से अछूते न रह सके। धर्म की परिभाषाएँ बदल डाली गईं और अनुयायियों ने हालात के दबाव में अपनी धार्मिक पहचान को नए रूप में गढ़ लिया।
पवित्रता और चरित्र का वह गहना, जो हर युग और हर धर्म में स्त्रियों की असली शोभा और विशिष्टता माना जाता था, आधुनिकता के नाम पर उतार फेंका गया। नतीजा यह हुआ कि बहुधर्मी समाज में मुसलमान भी इस तूफ़ान से बच नहीं पाए। यह बीमारी धीरे-धीरे अनगिनत मुस्लिम परिवारों को अपनी गिरफ़्त में लेती चली गई।
जहाँ तक धर्म का संबंध है, इस्लाम किसी काल्पनिक कथा या दंतकथा का नाम नहीं है, जिसे समय और परिस्थितियाँ बदल दें। बल्कि यह एक संपूर्ण जीवन-दर्शन है, जो हर युग और हर परिस्थिति में अपने अनुयायियों को सीधी और सच्ची राह दिखाता है। यह मनुष्य की बनाई हुई व्यवस्था नहीं, बल्कि उस परमेश्वर का दिया हुआ विधान है जिसने मानव की रचना की है।
इस्लाम ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के लिए स्पष्ट और ठोस सिद्धांत निर्धारित किए हैं। कोई कार्य या आंदोलन यदि इन सिद्धांतों और मर्यादाओं के भीतर है तो वह स्वीकार्य है, किंतु यदि वह सीमा से बाहर है तो किसी भी रूप में मान्य नहीं हो सकता। आज यदि हम प्रचलित नृत्य और संगीत को इस्लामी सिद्धांतों की कसौटी पर परखें, तो यह स्पष्ट होता है कि नृत्य और संगीत हर परिस्थिति में अनुचित, निंदनीय और हराम हैं — चाहे उन्हें खुले मंच पर प्रस्तुत किया जाए या फिर “कला” का नाम देकर वैध ठहराने की कोशिश की जाए।
अल्लाह तआला का फ़रमान है:
وَ مِنَ النَّاسِ مَنْ یَّشْتَرِیْ لَهْوَ الْحَدِیْثِ لِیُضِلَّ عَنْ سَبِیْلِ اللّٰهِ بِغَیْرِ عِلْمٍ وَّ یَتَّخِذَهَا هُزُوًا اُولٰٓىٕكَ لَهُمْ عَذَابٌ مُّهِیْنٌ(6)
“और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो व्यर्थ की बातें खरीदते हैं, ताकि बिना समझे-बूझे लोगों को अल्लाह के रास्ते से भटका दें और उसका मज़ाक उड़ाएँ। ऐसे ही लोगों के लिए अपमानजनक और दर्दनाक सज़ा है।”
(क़ुरआन: सूरह लुक़मान, आयत 6)
इस आयत में “लह्वुल–हदीस” के अंतर्गत वे सभी साधन और तरीके आते हैं जो इंसान को ग़फ़लत में डाल दें और उसे इच्छाओं की गुलामी की तरफ ले जाएँ। चाहे वह गाने-बजाने के रूप में हो, झूठी कहानियों, काल्पनिक अफ़सानों और उपन्यासों के रूप में हो, या फिर नाटक, वासनात्मक भावनाओं को भड़काने वाली फ़िल्में, इश्क़िया शायरी या अश्लील चुटकुलों के रूप में — ये सब बातें और इनके लिए होने वाली महफ़िलें तथा इनके लिए बनाए गए संस्थान, सब इस आयत की पकड़ में आते हैं। इसी तरह, जिस प्रकार गाने-बजाने को इस्लाम में नापसंद और निषिद्ध बताया गया है, ठीक उसी प्रकार वे सारे साज़ और उपकरण भी इसी हुक्म में शामिल हैं जिनका इस्तेमाल गाने-बजाने के लिए किया जाता है।
(आसान तफ़सीर, मौलाना खालिद सैफ़ुल्लाह रहमानी)
इस्लाम में पवित्रता और चरित्र का महत्व
ग़ैर-महरम (अजनबी पुरुष या स्त्री) से मेलजोल और घुलने-मिलने की इस्लाम में किसी भी कारण से इजाज़त नहीं है। इस संदर्भ में एक मिसाल मशहूर है: अगर शिक्षा देने वाला बायज़ीद बस्तामी जैसा आलिम हो, शिक्षा पाने वाली राबिआ बसरी जैसी पवित्र स्त्री हो, स्थान काबा हो और पुस्तक क़ुरआन हो — तब भी इस मेलजोल की अनुमति नहीं है।
इस्लाम ने पवित्रता और चरित्र की रक्षा के लिए ऐसे सिद्धांत निर्धारित किए हैं कि यदि उनका पालन किया जाए तो बे-हयाई और अनैतिकता के दरवाज़े लगभग बंद हो जाते हैं।
अल्लाह तआला का फ़रमान है:
وَ لَا تَقْرَبُوا الزِّنٰۤى اِنَّهٗ كَانَ فَاحِشَةً وَ سَآءَ سَبِیْلًا(32)
“ज़िना के पास भी न जाओ। निस्संदेह यह अत्यंत अश्लील और बुरा मार्ग है।”
(क़ुरआन, सूरह इस्रा: 32)
इस आयत में ज़िना (व्यभिचार) की भयानकता स्पष्ट करते हुए कहा गया कि उन सभी कार्यों के पास भी न फटको जो इंसान को ज़िना की ओर ले जाते हैं — चाहे वह नग्नता हो, स्त्री-पुरुष का बेझिझक मेलजोल, अजनबी पुरुष के साथ अकेलापन, पार्टियों या फैशन के नाम पर अजनबियों के साथ उठना-बैठना, या प्राकृतिक इच्छाओं के नाम पर पवित्रता और चरित्र का सौदा करना हो। हर वह काम जो व्यभिचार की राह को आसान बनाए, इस आयत की मनाही में शामिल है।
ज़िना के अनेकों दुष्परिणाम हैं। उनमें से एक यह है कि स्त्री अपना सम्मान और गरिमा खो बैठती है। माँ, बेटी, बहन और पत्नी के रूप में जो उसे सम्मान और प्रतिष्ठा मिली होती है, वह सब मिट्टी में मिल जाता है। कई बार यह बीमारी इतना बड़ा फ़साद पैदा कर देती है कि हत्या और ख़ून-ख़राबे तक पहुँच जाती है। आए दिन इस तरह की ख़बरें सुनने और देखने को मिलती रहती हैं, लेकिन आधुनिकता के दीवाने लोग इन बुराइयों से इतनी लिप्तता महसूस करने लगे हैं कि तमाम नुक़सानात जानने के बावजूद उसी अंधी खाई में गिरते चले जा रहे हैं। आख़िरत में ज़िना का जो भयानक अज़ाब है, वह तो अलग ही है, जिसे हज़रत मुहम्मद ﷺ ने हदीस-ए-मे़राज़ में विस्तार से बयान किया है।
इस्लाम की पवित्रता और चरित्र की प्रणाली
इस्लाम की शिक्षाओं में पवित्रता और चरित्र को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यह केवल व्यक्तिगत सद्गुण नहीं बल्कि सामाजिक व्यवस्था और मानवीय जीवन की स्थिरता की आधारशिला है। इस्लाम ने जीवन के हर क्षेत्र में ऐसे स्पष्ट सिद्धांत और नियम निर्धारित किए हैं, जो इंसान को अनैतिकता और व्यभिचार से दूर रखते हैं। कुरआन ने ज़िना को न केवल एक घृणित कार्य बताया है, बल्कि उसके आसपास ले जाने वाले हर कारण और साधन से भी दूर रहने की हिदायत दी है।
एक लंबी रिवायत में आता है कि एक युवक अल्लाह के रसूल ﷺ की सेवा में हाज़िर हुआ और उसने आप ﷺ से ज़िना (व्यभिचार) की अनुमति माँगी। आप ﷺ ने उस युवक को समझाया कि दुनिया में कोई भी औरत ऐसी नहीं है जो किसी की माँ, बहन, बेटी, पत्नी या फूफी (पिता की बहन) न हो। क्या तुम अपनी रिश्तेदार औरतों के लिए ज़िना बर्दाश्त कर सकोगे? उस युवक ने जवाब दिया — नहीं। तब आप ﷺ ने उसके हाथों को अपने हाथ में लेकर दुआ की:
اللَّهُمَّ اغْفِرْ ذَنْبَهُ وَ طَهِّرْ قَلْبَهُ وَ حَصِّنْ فَرْجَهُ
(ऐ अल्लाह! इसके गुनाह माफ़ कर दे, इसके दिल को पाक-साफ़ कर दे और इसकी शर्मगाह की हिफ़ाज़त फ़रमा)।
रसूल ﷺ जब औरतों से बैअत (प्रतिज्ञा) लिया करते थे तो उनसे यह वादा भी लिया करते थे:
وَلا يَزْنِينَ وَلا يَقْتُلْنَ أَوْلَادَهُنَّ وَلا يَأْتِينَ بِبُهْتَانٍ
(वो बदकारी नहीं करेंगी, अपनी औलाद को क़त्ल नहीं करेंगी और झूठा इल्ज़ाम नहीं लगाएंगी)।
(क़ुरआन: सूरह मुम्तहना आयत 12)
इस्लाम में पवित्रता और चरित्र का दर्जा इतना ऊँचा है कि अल्लाह के रसूल ﷺ औरतों से बैअत लेते समय भी उनकी पवित्रता की हिफ़ाज़त पर ज़ोर देते थे।
“इस्लाम का निज़ाम-ए-इफ़्फ़त ओ इस्मत” इसी नाम से मुफ़्ती ज़फ़ीरुद्दीन साहिब मिफ़्ताही (पूर्व मुफ़्ती, दारुल उलूम देवबंद) की मशहूर और असरदार संरचना है। इस किताब का अध्ययन अत्यंत लाभदायक और फलदायी साबित होगा।
निगाहों की रक्षा
इस्लाम धर्म ने पवित्रता और चरित्र की रक्षा के लिए स्त्री और पुरुष दोनों को बार-बार विभिन्न तरीक़ों से सचेत किया है। अल्लाह तआला ने आदेश दिया:
قُلْ لِّلْمُؤْمِنِیْنَ یَغُضُّوْا مِنْ اَبْصَارِهِمْ وَ یَحْفَظُوْا فُرُوْجَهُمْ ذٰلِكَ اَزْكٰى لَهُمْ
“ईमान वाले पुरुषों से कहो कि वे अपनी दृष्टि नीची रखें और अपनी लज्जा की रक्षा करें, यही उनके लिए अधिक पवित्र है।”
(सूरह अन-नूर आयत 30)
इस आदेश में पुरुषों को यह हिदायत दी गई है कि वे अपनी दृष्टि संयमित रखें, क्योंकि जब आँख गलती करती है तो उसका प्रभाव मन पर पड़ता है और फिर मनुष्य ऐसे पापों में पड़ जाता है, जिससे उसकी प्रतिष्ठा ही नहीं बल्कि कभी-कभी उसका विश्वास भी संकट में आ जाता है।
एक अन्य स्थान पर अल्लाह तआला ने कहा:
قُلْ لِّلْمُؤْمِنٰتِ یَغْضُضْنَ مِنْ اَبْصَارِهِنَّ وَ یَحْفَظْنَ فُرُوْجَهُنَّ وَ لَا یُبْدِیْنَ زِیْنَتَهُنَّ اِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَ لْیَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلٰى جُیُوْبِهِنَّ وَ لَا یُبْدِیْنَ زِیْنَتَهُنَّ
“ईमान वाली स्त्रियों से कहो कि वे अपनी दृष्टि नीची रखें, अपनी पवित्रता की रक्षा करें और अपनी शोभा-श्रृंगार को प्रकट न करें, सिवाय उस भाग के जो अपने आप दिखाई देता है। और वे अपने दुपट्टे अपने गले और सीने पर डालकर रखें तथा अपनी सजावट को उजागर न करें।”
(सूरह अन-नूर आयत 31)
यह केवल दो आदेश नहीं हैं, बल्कि पवित्र कुरआन और हदीस में अनेक स्थानों पर पवित्रता और चरित्र की रक्षा तथा उसकी महत्ता को बनाए रखने के लिए स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं।
इस्लाम में परदा का जो स्थान है, उसका उद्देश्य भी यही है कि मनुष्य अपनी पवित्रता और चरित्र की रक्षा कर सके। पवित्रता और चरित्र मनुष्य का वह वास्तविक आभूषण है, जिस पर उसकी मर्यादा और गरिमा टिकी हुई है। यदि मनुष्य का स्वभाव पवित्रता और चरित्र से खाली हो जाए, तो उसमें इस हद तक उच्छृंखलता आ जाती है कि फिर उसमें और पशुओं में कोई भेद नहीं रह जाता। जिस प्रकार पशुओं में पवित्रता और चरित्र का कोई भाव नहीं होता, उसी प्रकार ऐसे लोग भी इस भाव से बहुत दूर हो जाते हैं।
पर्दा की शरीया कानूनी स्थिति और वर्तमान युग की मानसिकता
बुरी नज़र के नुकसान
रसूल-ए-अकरम ﷺ ने फ़रमाया:
النَّظَرَةُ سَهْمٌ مَسْمُومٌ مِنْ سِهَامِ إِبْلِيسَ، مَنْ تَرَكَهَا مِنْ مَخَافَتِي أَبْدَلْتُهُ إِيمَانًا يَجِدُ حَلاوَتَهُ فِي قَلْبِهِ
“नज़र (बुरी नज़र / ग़लत नज़र) इब्लीस (शैतान) के ज़हरीले तीरों में से एक तीर है। जो कोई उसे मेरे डर (अल्लाह के भय) की वजह से छोड़ देता है, तो मैं उसके बदले उसे ऐसा ईमान अता करता हूँ जिसकी मिठास वह अपने दिल में महसूस करता है।”
(अल-तरग़ीब व अल-तरहीब)
बुरी नज़र का मतलब है ग़ैर-मेहरम को ग़लत निगाहों से देखना। इसके नुकसान बेहिसाब हैं। यह इंसान के दिल को गंदा कर देती है और उसे इबादत की लज़्ज़त से महरूम कर देती है।
बुरी नज़र इंसान के दिल में तरह-तरह के बुरे ख्याल और वहम पैदा करती है। कई बार यही ख्याल इंसान को वास्तविक जीवन में गुनाह और गंदगी के गहरे गढ्ढे में धकेल देते हैं। जो लोग बुरी नज़र में डूब जाते हैं, उनके दिल से पवित्रता और चरित्र की अहमियत मिट जाती है। दिल की पाकीज़गी और इबादत की मिठास पाने के लिए ज़रूरी है कि इंसान बुरी नज़र से पूरी तरह बचे और हमेशा अल्लाह तआला से भलाई की दुआ माँगे।

