बच्चों की सही परवरिश: इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार बच्चों का पालन-पोषण और नैतिक विकास

बच्चों के पालन-पोषण का विषय उन महत्वपूर्ण विषयों में से है, जिनसे समाज की पहचान और राष्ट्र व समुदाय के उत्थान व पतन की कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। यह इतना संवेदनशील विषय है कि इसमें थोड़ी सी भी ढील बच्चों को राह से विचलित और गुमराह कर सकती है। जिस तरह एक वास्तुकार एक भव्य और सुंदर भवन बनाने से पहले दृढ़ और टिकाऊ नींव पर अधिक जोर देता है, उसी तरह उच्च चरित्र और उज्ज्वल भविष्य के लिए बच्चों के उत्कृष्ट पालन-पोषण पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि भवन की नींव दुर्बल और अस्थिर हो तो उस पर भव्य और स्थायी निर्माण की कल्पना करना असंभव है। ठीक इसी तरह यदि छोटे बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा और पालन-पोषण अपर्याप्त और अस्थिर हो तो उज्ज्वल भविष्य की आशाएँ धुंधली और मंद हो जाती हैं।

बच्चों के पालन-पोषण की पहली उत्तरदायित्व माता-पिता की होती है। बच्चा जब आँखें खोलता है, तो उसे ऐसे मार्गदर्शक और शिक्षक की आवश्यकता होती है जो उसका हाथ थामकर चलना सिखाए, हर कदम पर मार्गदर्शन करे और उसे सीधे मार्ग पर चलने वाला बनाए। जीवन के इस चरण में बच्चे के लिए माता-पिता ही सब कुछ होते हैं। वे जैसा मार्गदर्शन करते हैं और जो सिखाते हैं, ठीक वैसी ही बातें बच्चों के हृदय और मस्तिष्क पर अंकित होती चली जाती हैं। कारण यह है कि उनके हृदय स्वच्छ और पारदर्शी दर्पण की तरह निर्मल होते हैं तथा वे उन सुंदर और चमकदार मोतियों जैसे होते हैं जो किसी भी चित्र या आकृति से पूरी तरह खाली होते हैं, और एक चित्रकार जैसा चाहे उन पर चित्रांकन कर सकता है। इसलिए शुरू से ही उनकी सही पालन-पोषण की जाए, उन्हें उत्तम नैतिक गुणों से सुसज्जित किया जाए, शिक्षा के आभूषण से सजाया जाए, उनके हृदयों को भलाई और नेकी की ओर झुकाया जाए, दुनिया और आख़िरत (परलोक) की सुख-समृद्धि तथा पुरस्कारों से अवगत कराया जाए। उन्हें केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए लाभदायक बनाया जाए।

माता-पिता की लापरवाही और अपर्याप्त शिक्षा तथा पालन-पोषण के कारण बच्चा विभिन्न सामाजिक बुराइयों में ग्रस्त हो जाता है, जिससे वह मार्गभ्रष्टता का शिकार हो जाता है। उदाहरण के लिए, बच्चे को पूरी स्वतंत्रता दे देना कि जहाँ चाहें जाएँ, जिसके साथ चाहें उठें-बैठें, मोबाइल या लैपटॉप आदि दे देना और इस पर निगरानी न करना कि वह उनका उपयोग किस प्रकार कर रहा है—सकारात्मक या नकारात्मक। स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में उसका संपर्क दोनों प्रकार के बच्चों से होगा, अर्थात् अच्छे भी और बुरे भी। और बचपन में जैसी संगति मिलती है, वैसी ही आदतें और स्वभाव बाद की ज़िंदगी में प्रकट होते हैं।

सुधार और पालन-पोषण के लिए सबसे मूलभूत वस्तु, जो बच्चों के पालन-पोषण तथा तैयारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और एक उचित नैतिक शिक्षा की नींव मजबूत करने की गारंटी होती है, वह एक शुद्ध और पवित्र नैतिक वातावरण है। यदि वह परिवार जिसमें बच्चा आँखें खोलता है, इस्लामी शिक्षाओं पर अमल करने वाला हो, उसके माता-पिता इस्लामी जीवन का आदर्श प्रस्तुत करते हों, तो उनकी शिक्षा के प्रभाव जीवन भर रहते हैं। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि पहले अपने घरों का वातावरण अच्छा बनाएँ और ऐसी वातावरण तैयार करें जिसमें पलने वाले बच्चे नैतिकता और चरित्र के आदर्श बन जाएँ। यदि पहले स्वयं की सुधार नहीं करेंगे तो कितनी भी कोशिश करें, वह व्यर्थ होगी। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के शिक्षा-पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि आप ने अपने साथियों को जो-जो बात सिखाई, उसका स्वयं व्यावहारिक आदर्श प्रस्तुत किया।

पालन-पोषण के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी विचारणीय है कि बच्चों के साथ सदैव करुणा और प्रेम का व्यवहार किया जाए, प्रेम तथा कोमलता से पेश आया जाए; क्योंकि प्रेम की भाषा शीघ्र ही हृदय में उतर जाती है। कठोरता से बचाव करें, क्योंकि यह घृणा और विद्रोह का कारण बन सकती है। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम बच्चों के पालन-पोषण में विशेष रूप से करुणा, प्रेम, उत्तम व्यवहार तथा कोमलता और बुद्धिमत्ता से भरे ढंग का विशेष ध्यान रखते थे। इस संबंध में हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं: मैंने दस वर्ष तक नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम की सेवा में बिताए, आप ने कभी किसी बात पर मुझे “उफ़” तक नहीं कहा, न कभी मुझ पर क्रोधित हुए और न कभी डाँटा-फटकारा। बल्कि किसी काम को करने पर यह नहीं फरमाया कि “यह काम तूने क्यों किया?” और न करने पर यह नहीं फरमाया कि “यह क्यों नहीं किया?” आप चरित्र और नैतिकता में सभी लोगों से सर्वोत्तम और श्रेष्ठ थे। (सहीह बुख़ारी:1973, सहीह मुस्लिम: 2330, शमाइल तिरमिज़ी)

दूसरा चरण बच्चे की शिक्षा का आता है। इस चरण में भी माता-पिता का उत्तरदायित्व है कि वे सर्वप्रथम दीन की शिक्षा का प्रबंध करें। इसके लिए ऐसी शिक्षण संस्था का चयन करें जहाँ शुद्ध इस्लामी वातावरण में शिक्षा तथा पालन-पोषण का सर्वोत्तम व्यवस्था हो। ऐसी संस्था का बिल्कुल भी चयन न करें जहाँ गैर-इस्लामी वातावरण हो तथा जहाँ पाश्चात्य प्रभावों का प्रभुत्व हो। कारण यह है कि ऐसा वातावरण इस्लाम से दूर ले जाता है, और यह दूरी उसे नास्तिकता तथा धर्महीनता के द्वार तक पहुँचा देती है। आज जो मुस्लिम अवनति तथा पतन का शिकार है, वह इस्लामी शिक्षाओं से दूरी के कारण ही है। अतः यह दृढ़ संकल्प करें कि हम नई पीढ़ी को इस्लामी शिक्षाओं से सुसज्जित तथा अलंकृत करेंगे और एक पूर्ण इस्लामी वातावरण की नींव डालेंगे। मुस्लिम होने के नाते हमारे लिए इस बात का जानना अत्यंत आवश्यक है कि हमारी सफलता तथा समृद्धि का आधार धार्मिक मामलों तथा धार्मिक शिक्षा से जुड़ाव में निहित है। यदि हमारा जीवन इस्लाम धर्म के बताए हुए सिद्धांतों पर चल रहा है तो संसार में भी विजय प्राप्त होगी और आख़िरत (परलोक) में भी अल्लाह तआला सर्वोत्तम प्रतिफल प्रदान करेंगे। मोमिन की जीवन का लक्ष्य केवल सांसारिक सफलता नहीं है, बल्कि दीन और दुनिया दोनों में सफल होना है।

संक्षेप यह है कि बच्चों के अच्छे या बुरे बनने में माता-पिता के पालन-पोषण तथा उनकी निगरानी का बहुत बड़ा योगदान होता है। यह माता-पिता का प्रमुख उत्तरदायित्व है कि वे अपनी संतान की धार्मिक तथा इस्लामी शिक्षा का विशेष ध्यान रखें, उन्हें बचपन से ही उत्तम नैतिकता तथा चरित्र वाला बनाएँ और दीन से उनका संबंध उनके मन-मस्तिष्क में दृढ़ता से स्थापित कर दें।

 

यह लेख मौलाना असद इक़बाल क़ासमी द्वारा लिखित है।

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