ज्ञान का महत्व और श्रेष्ठता, साथ ही पढ़ने की कीमत और मूल्य के बारे में लेख बहुतायत में लिखे और पढ़े जाते हैं। कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक लेख “अब्बासी शासन में किताबों और पुस्तकालयों का महत्व” नजर से गुजरा। इस लेख को पढ़ने के बाद वर्तमान परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में कुछ बातें मन में आईं। नीचे उन बातों को शब्दों में उतारने का प्रयास किया गया है।
इस्लाम धर्म का पहला आदेश “पढ़” (इक़रा) है, और इससे इस्लाम में ज्ञान के महत्व का अनुमान होता है। क्या मुस्लिम समुदाय अपने पैगंबर हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के आदेश पर चल रहा है, या फिर इस समुदाय ने इस आदेश को भुला दिया है? शिक्षा वह पवित्र वस्तु है, जिसके कारण अल्लाह ने हजरत आदम (अलैहिस्सलाम) को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी का दर्जा दिया। ज्ञान का महत्व हर युग में स्वीकार किया गया है, और ज्ञानी लोग हर काल में सम्मानित माने गए हैं। ज्ञान मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग करता है और उसे सभ्यता व संस्कृति का ध्वजवाहक बनाता है। सभ्यता और संस्कृति का संबंध ज्ञान से है; बिना ज्ञान के मनुष्य में पशुता और जंगलीपन के सिवा कुछ नहीं बचता।
अल्लाह ने कुरान में कई जगह ज्ञान और ज्ञानियों के महत्व और श्रेष्ठता को बताया है। एक जगह ईश्वरीय वचन है:
“قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ ۗ إِنَّمَا يَتَذَكَّرُ أُولُو الْأَلْبَابِ
“कहो, क्या वे लोग जो जानते हैं और जो नहीं जानते, बराबर हो सकते हैं? निश्चय ही केवल बुद्धिमान लोग ही नसीहत ग्रहण करते हैं।” (सूरह अज़्-जुमर, 9)
इस आयत में अल्लाह ने ज्ञानियों और अज्ञानियों के बीच एक स्पष्ट रेखा खींच दी है। एक अन्य स्थान पर ज्ञानियों की महिमा बताते हुए अल्लाह कहते हैं:
اِنَّمَا يَخْشَى اللّـٰهَ مِنْ عِبَادِهِ الْعُلَمَآءُ
“निश्चय ही अल्लाह से उसके बंदों में केवल विद्वान ही डरते हैं।” (सूरह फ़ातिर, 28)
यह सत्य है कि ज्ञान के आधार पर मनुष्य ईश्वरीय सत्य से परिचित हो जाता है और उन बातों को भी अच्छी तरह जान लेता है, जिनसे अज्ञानी अनजान रहते हैं। ज्ञान के बल पर वह ईश्वर की असंख्य अद्भुत रचनाओं का अवलोकन करता है और धरती व आकाश में फैली लाखों निशानियों पर विचार करके ईश्वरीय निकटता की आनंदमयी अनुभूति प्राप्त करता है। ज्ञान की बदौलत मनुष्य उन रहस्यों को खोलता है जो नजरों से छिपे होते हैं। ज्ञान की गहराई में डुबकी लगाकर वह उन मोतियों को खोज निकालता है, जिनका पीछा करना असंभव प्रतीत होता है। वर्तमान युग में नई तकनीक और नवीन संसाधन ज्ञान की उपज हैं। अनुसंधान के क्षेत्र में हर दिन नए-नए खुलासे ज्ञान के प्रेमियों के ऋणी हैं। जब तक ज्ञान के सागर में गोता लगाने वाले लोग मौजूद रहेंगे, तब तक नई खोजों का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा।
नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया:
“إنما بُعِثتُ مُعَلِّمًا”
“मैं शिक्षक बनाकरभेजा गया हूँ।” (सुनन इब्ने माजा, 229)
इस हदीस से ज्ञान और ज्ञानियों का महत्व और भी स्पष्ट होता है। आपने अपनी आगमन का उद्देश्य ज्ञान के प्रचार और प्रसार को बताया। इसलिए आप पर पहली वही “पढ़” के रूप में उतरी। बदर की जंग में जब बंदियों की रिहाई का मुद्दा सामने आया और विभिन्न राय सामने आईं, तो उनमें एक यह थी कि जो बंदी पढ़ना-लिखना जानते हैं, वे दस-दस बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाएं, और यही शिक्षा उनकी आजादी का परवाना होगा। नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और उनके सहाबियों ने अपनी जान-माल और इस्लाम के दुश्मनों की जान बख्शने को ज्ञान सिखाने पर निर्भर किया था। इस घटना से ज्ञान के महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।
ज्ञान की खोज और तलाश में यात्रा करने वालों की श्रेष्ठता बताते हुए आपने फरमाया:
مَنْ خَرَجَ فِیْ طَلَبِ الْعِلْمِ فَھُوَ فِیْ سَبِیْلِ اللہِ حَتّٰی یَرْجِعَ
“जो ज्ञान की तलाश में निकला, वह तब तक अल्लाह के रास्ते में है, जब तक वह लौट नहीं आता।”
कुरान और हदीसों में जगह-जगह ज्ञान और ज्ञानियों के महत्व और श्रेष्ठता का उल्लेख है। बल्कि एक जगह रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ज्ञान और बुद्धि को मुसलमानों का खोया हुआ खजाना बताया:
الحِكْمَةُ ضَالَّةُ الْمُؤْمِنِ فَحَيْثُ وَجَدَهَا فَهُوَ أَحَقُّ بِهَا
“बुद्धि मुसलमान की खोई हुई पूंजी है, जहां मिले और जैसे मिले, उसे हासिल कर लेना चाहिए।” ज्ञान और बुद्धि मुसलमानों की खोई हुई पूंजी है, जहाँ मिले और जैसे मिले, उसे प्राप्त कर लेना चाहिए।
इस्लाम के शुरुआती दौर में या इस्लामी शासन के समय, लोग ज्ञान की खोज में एक देश से दूसरे देश की यात्रा करते थे। हजारों मील का सफर तय करके एक-एक हदीस और एक-एक मसले को जानने के लिए पहुंच जाया करते थे। अपनी जिंदगी का अधिकांश हिस्सा किसी ज्ञानी की सेवा और ज्ञान की खोज में भटकते हुए बिता देते थे। अब्बासी युग में मुसलमानों का वैज्ञानिक उत्कर्ष अपने चरम पर था। सभी खलीफाओं, मंत्रियों और अमीरों के महलों में पुस्तकालय थे; एक भी महल इससे खाली नहीं था। इसका अंदाजा अबू बक्र बिन यह्या अस-सूली के एक वाकये से लगता है, जब उसने खलीफा रज़ी बिल्लाह से कहा: “लोगों में यह चर्चा है कि हमारे स्वामी ने अपनी विद्वता और महानता के बावजूद पूर्व खलीफाओं की परंपरा को कायम रखते हुए अपने महल में पुस्तकालय स्थापित किया है।” इस घटना से अंदाज़ा होता है कि मुस्लिम बादशाहों में ज्ञान की कितनी क़द्र थी और वे स्वयं ज्ञान के कितने शौक़ीन हुआ करते थे।
ज्ञान के महत्व को बनाए रखने के लिए खलीफ़ाओं का विशेष तरीका यह था कि वे विद्वानों और लेखकों को उनकी पुस्तकों की रचना और प्रकाशन पर बहुमूल्य पुरस्कारों से सम्मानित करते थे। बग़दाद का प्रसिद्ध “बैतुल हिक्मा” (House of Wisdom) आज भी अपने वैभव और ज्ञान-परंपरा के लिए जाना जाता है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि अब यह केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह गया है। न तो इसे पुनर्जीवित करने की कोशिश की गई और न ही इस्लामी दुनिया में इसका कोई विकल्प स्थापित हो सका।
पुस्तकों के प्रति असीम प्रेम, उन्हें संग्रह करने का जुनून, उनसे ज्ञान प्राप्त करने की लालसा और अपने घरों को पुस्तकों से सजाने का उत्साह इतना प्रबल था कि लोग इसके लिए बड़ी से बड़ी क़ुर्बानियाँ देने के लिए भी तैयार हो जाते थे। पुस्तकों का मालिक होना और विद्वानों की सभाओं में शामिल होना, गौरव की बात मानी जाती थी। मुसलमानों के दिलों में ज्ञान की अहमियत को रचाने-बसाने के लिए जनसाधारण स्तर पर और मस्जिदों में पुस्तकालय स्थापित किए गए थे।
जब तक मुसलमानों में ज्ञान का उत्साह और उसकी तलाश का जुनून जीवित रहा, तब तक उन्होंने वैज्ञानिक और बौद्धिक दुनिया पर प्रभुत्व बनाए रखा। मुस्लिम चिकित्सकों, वैज्ञानिकों, गणितज्ञों, खगोलशास्त्रियों और भूगोलवेत्ताओं और अन्य विद्या व कला के विशेषज्ञों ने ऐसी खोजें कीं, जिन्होंने मानव सभ्यता को नई दिशा दी। आज भी उनके वैज्ञानिक कार्यों को दुनिया सम्मान और गर्व की नज़र से देखती है। लेकिन जिस दिन मुसलमानों ने ज्ञान से दूरी बनाई और अपनी पहचान उससे तोड़ ली, उसी दिन से उनका पतन आरंभ हो गया। और तब से लेकर आज तक शायद ही कोई उल्लेखनीय कार्य कर सके हैं। यह विडंबना है कि जिस पैगंबर ﷺ ने ज्ञान के महत्व को स्पष्ट करने के लिए स्वयं को “शिक्षक” कहा, उसी पैगंबर की उम्मत आज ज्ञान से कोसों दूर जा चुकी है।
उर्दू साहित्य के महान कवि जॉन एलिया का यह कथन — “हम हज़ार वर्षों से इतिहास की दस्तरख़ान पर हरामखोरी के सिवा कुछ नहीं कर रहे” — केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक स्थिति का बेबाक आईना है। इस जुमले की गहराई को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम अपने अतीत और वर्तमान पर नज़र डालें। हमें यह आकलन करना होगा कि पिछले कुछ शताब्दियों में हमने क्या खोजा और कौन से वैज्ञानिक कार्य हमारे कारण हुए। इस्लामी दुनिया आज विश्व के उच्चस्तरीय शैक्षिक संस्थानों से खाली है। दुखद बात यह है कि इस कमी को पूरा करने की कोशिश भी हम नहीं कर रहे। आधुनिक दुनिया के वैज्ञानिक कार्यों में हमारा कहीं कोई जिक्र नहीं है। अनुसंधान और शोध के क्षेत्र में हमारी कोई पहचान नहीं है। यहां तक कि धार्मिक मामलों में भी हम दूसरों की सहायता पर निर्भर हैं।
यूरोप और अमेरिका के लोग आज दुनिया में सम्मान की नज़र से इसलिए देखे जाते हैं क्योंकि उनके यहाँ ज्ञान और विद्वानों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उनके पास विश्व-स्तरीय शैक्षिक संस्थान हैं, अनुसंधान और शोध के उत्कृष्ट केंद्र हैं। उनका शैक्षिक स्तर दुनिया के अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक ऊँचा है। वहाँ शिक्षा को जीवन का अभिन्न अंग माना जाता है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वे भली-भाँति जानते हैं कि उनकी सत्ता, प्रतिष्ठा और वैश्विक नेतृत्व तब तक स्थिर रह सकता है, जब तक ज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में उनका कोई समान स्तर का साथी न हो।
दुनिया में प्रगति के शिखर तक पहुंचने के लिए अपनी समुदाय को ज्ञान के महत्व और श्रेष्ठता से परिचित कराना जरूरी है। इतिहास के पन्नों और विश्व की विभिन्न समुदायों के उत्थान-पतन का अध्ययन करने के बाद यह स्पष्ट हो चुका है कि जो कौम शिक्षा के आभूषण से सुसज्जित होती है, वही ऊंचाइयों की ओर बढ़ती है और उसे सम्मान की नज़र से देखा जाता है।
हैरत है कि शिक्षा और प्रगति में है पीछे,
जिस क़ौम का आरंभ हुआ था “पढ़” (इक़रा) से ।

