सफल जीवन का रहस्य: उद्देश्य और जिम्मेदारी के स्तंभों पर खड़ी ज़िंदगी

मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी

✍️ मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी (निदेशक: अल-ग़ज़ाली इंटरनेशनल स्कूल (जीआईएस), अररिया, बिहार)

दुनिया की ‘आरज़ी फ़ितरत’ (अस्थायी प्रकृति) से परिचित होने के बावजूद जीवन को बिना उद्देश्य गुज़ारना इंसानी चेतना या समझ की सबसे बड़ी विफलता है। जब इंसान यह जानता है कि यह दुनिया सिर्फ़ एक पड़ाव है — एक लम्हाती साया (क्षणिक छाया) जो सूरज ढलते ही मिट जाता है — तब भी अगर वह अपने अस्तित्व के मायने तलाश नहीं करता, तो दरअसल वह अपने ही अस्तित्व से बेईमानी करता है। इसके विपरीत, जब इंसान अपनी ज़िंदगी को किसी उच्च उद्देश्य से जोड़ लेता है, तो उसके सामने ‘फ़ना’ (नाशवानता) की इस दुनिया में ‘बक़ा’ (स्थायित्व या अमरता) का असली अर्थ उभर आता है।

यही कारण है कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने क़ुरआन-ए-हकीम में बार-बार इंसान को उसके जीवन के उद्देश्य की याद दिलाई है और इस दुनिया की फ़ानी हक़ीक़त (नाशवान सच्चाई) को अत्यंत स्पष्ट और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:

وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْاِنْسَ اِلَّا لِيَعْبُدُوْنِ

“मैंने जिन्न और इंसानों को सिर्फ़ अपनी इबादत के लिए पैदा किया है।”( सूरह अज़-ज़ारियात: 56)

यह आयत इंसान के अस्तित्व के मूल उद्देश्य को स्पष्ट करती है — कि उसकी ज़िंदगी का वास्तविक अर्थ यही है कि वह अपने ख़ालिक़ (सृष्टिकर्ता) की बंदगी में सर झुकाए और उसकी इताअत (उपासना और आज्ञापालन) को अपनी ज़िंदगी का उद्देश्य बना ले। इसी के साथ अल्लाह तआला फ़रमाता है:

اِعْلَمُوٓا اَنَّمَا الْحَيَاةُ الـدُّنْيَا لَعِبٌ وَّلَـهْوٌ وَّزِيْنَةٌ وَّّتَفَاخُـرٌ بَيْنَكُمْ وَتَكَاثُـرٌ فِى الْاَمْوَالِ وَالْاَوْلَادِ ۖ كَمَثَلِ غَيْثٍ اَعْجَبَ الْكُفَّارَ نَبَاتُهٝ ثُـمَّ يَهِيْجُ فَتَـرَاهُ مُصْفَرًّا ثُـمَّ يَكُـوْنُ حُطَامًا ۖ وَفِى الْاٰخِرَةِ عَذَابٌ شَدِيْدٌۙ وَّمَغْفِرَةٌ مِّنَ اللّـٰهِ وَرِضْوَانٌ ۚ وَمَا الْحَيَاةُ الـدُّنْيَآ اِلَّا مَتَاعُ الْغُرُوْرِ 

“जान लो कि दुनियावी ज़िंदगी तो केवल खेल-कूद, दिखावा, एक-दूसरे पर घमंड करने की होड़ और धन व संतान में बढ़त की लालसा। है। इसका उदाहरण उस बारिश की तरह है जिससे उगने वाली फ़सल किसानों को भली लगती है, फिर वह सूख जाती है, फिर तुम देखते हो कि वह पीली पड़ जाती है, और अंत में बिखरकर मिट्टी में मिल जाती है। और आख़िरत में या तो सख़्त अज़ाब (कठोर दंड) है या अल्लाह की मग़फ़िरत (क्षमा) और रज़ामंदी (संतुष्टि)।” (सूरह अल-हदीद,:20)

कुरान इस प्रकार इंसान को स्मरण कराता है कि दुनिया की चमक-दमक एक भ्रम है। असल कामयाबी वह है, जो परलोक की शाश्वत ज़िंदगी में प्राप्त होगी, जैसा कि अल्लाह का फरमान है:

وَمَا الْحَيَاةُ الـدُّنْيَآ اِلَّا مَتَاعُ الْغُرُوْرِ

“दुनियावी ज़िंदगी तो बस धोखे का सामान है।” (सूरह आल-ए-इमरान: 185) । इसलिए, जो व्यक्ति इन आयतों पर गहराई से विचार करता है, वह समझ लेता है कि दुनिया का कोई भी पल बिना उद्देश्य के नहीं है, बल्कि यह एक इम्तिहान(परीक्षा) है। इस इम्तिहान में वही व्यक्ति सफल होता है, जो अपनी ज़िंदगी को अपने खालिक (सृष्टिकर्ता) के हुक्म के अधीन कर लेता है।

जब हम कुरान के इस पृष्ठभूमि को सामने रखकर आज के समाज का विश्लेषण करते हैं, तो एक अत्यंत स्पष्ट और दुखद सच्चाई उभरकर सामने आती है: अधिकांश इंसानों ने अपनी ज़िंदगी के असल उद्देश्य से लगभग नाता तोड़ लिया है। आज का इंसान अपनी क्षमताओं और गतिविधियों का केंद्र केवल खुद को उभारना और दूसरों से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना बना चुका है। फलस्वरूप, उसकी सारी मेहनत, संघर्ष और चिंतन उसी सीमित घेरे में घूमते रहते हैं कि वह सामाजिक या आर्थिक मापदंडों पर दूसरों से आगे निकल जाए, चाहे उसकी कोशिशों में कोई उच्च उद्देश्य हो या न हो। यह सोच तार्किक रूप से भी गलत है, क्योंकि यदि इंसान अपनी सारी ऊर्जा केवल बाहरी श्रेष्ठता पर खर्च कर दे और उद्देश्यपूर्णता को अनदेखा कर दे, तो वह अपने ही वजूद के दर्शन से भटक जाता है। इसलिए, हमें यह याद रखना चाहिए कि जो कोशिश उद्देश्य से खाली हो, वह परिणामों के लिहाज से व्यर्थ होती है, और ऐसी कामयाबी, जिसमें अर्थपूर्णता न हो, नाकामी की एक सुंदर आकृति के सिवा कुछ नहीं है।

यह बिल्कुल ज़रूरी नहीं है कि उद्देश्यपूर्ण जीवन केवल वही व्यक्ति गुज़ार सकता है जो किसी ख़ास धार्मिक पेशे या धर्म की सेवा से जुड़ा हो। असल बात यह है कि इस्लाम ने “मक़सदियत” (उद्देश्यपूर्णता) को सिर्फ़ इबादत-ख़ानों या धार्मिक पदों तक सीमित नहीं किया है, बल्कि हर वैध व्यवसाय और इंसानी सेवा को अगर इरादा और इख़लास (सच्चाई) के साथ किया जाए, तो उसे भी इबादत का दर्जा दिया गया है।

अगर कोई व्यक्ति अपने पेशे में ईमानदारी, भलाई और समाज-सेवा को शामिल कर ले, तो वह काम, जो बाहरी तौर पर दुनियावी (सांसारिक) लगता है, दीन का रंग ओढ़ लेता है और आध्यात्मिक मूल्य प्राप्त कर लेता है। एक शिक्षक अपनी शिक्षा के माध्यम से, एक व्यापारी अपनी ईमानदारी के माध्यम से, एक चिकित्सक मानव सेवा के माध्यम से, एक नेता सच्ची राजनीति के माध्यम से, एक कवि अपनी कविता के माध्यम से, एक लेखक अपनी रचना के माध्यम से, और एक मज़दूर अपनी मेहनत और वफ़ादारी के माध्यम से उसी इलाही मक़सद (ईश्वरी उद्देश्य) को पूरा कर सकता है।

इस तरह इस्लाम इंसान को यह शऊर (चेतना) देता है कि ज़िंदगी का हर कार्य — अगर वह जायज़, लाभदायक और नेक नीयत पर आधारित हो — दीन का हिस्सा बन जाता है। और यही सोच, दुनिया की आम व्यस्तताओं को आख़िरत की कामयाबी (परलोक की सफलता) की सीढ़ी बना देती है।

यह इंसान की गहरी भूल है कि वह जवानी और शक्ति के समय को केवल आनंद और मौज-मस्ती के लिए समझता है। वह यह भ्रम पालता है कि अभी ज़िंदगी में बहुत समय शेष है, अभी तो आनंद का समय है—उद्देश्य और गंभीरता तो बुढ़ापे की बातें हैं। याद रखो! यही सोच वास्तव में ज़िंदगी का सबसे बड़ा धोखा है क्योंकि वे क्षण, जो शक्ति, जोश और ताज़गी से भरे होते हैं, वही असल में सबसे मूल्यवान और प्रभावी दिन होते हैं। जो व्यक्ति इन क्षणों को लापरवाही, मनोरंजन और खेल-कूद, या केवल सांसारिक व्यस्तताओं में गँवा देता है, वह अपनी उम्र की सबसे मूल्यवान पूँजी को स्वयं नष्ट कर देता है। सच्चाई यह है कि कोई नहीं जानता कि जिस “कल” के प्रतीक्षा में वह अपने सुधार और उद्देश्य को टालता रहता है, वह कल उसकी ज़िंदगी में आएगा भी या नहीं। इसलिए समझदार वही है जो अपने “आज” को पहचान ले क्योंकि जो क्षण हाथ में है, वही ज़िंदगी है; बाकी सब केवल आशाओं का मायाजाल है।

संक्षेप में, जब हम उद्देश्यपूर्ण जीवन की बात करते हैं, तो वास्तव में हमारा इशारा इस सच्चाई की ओर होता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी हैसियत और अवसर के अनुसार एक विशेष ज़िम्मेदारी का वहन करता है। यदि वह इस ज़िम्मेदारी से मुँह मोड़ता है, तो उसका जीवन उद्देश्य और अर्थ से खाली, मात्र गतिविधियों और हरकतों का समूह बनकर रह जाता है। क्योंकि उद्देश्यपूर्ण जीवन वही है, जिसमें व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी को पहचानकर पूरी निष्ठा के साथ उसे निभाने का प्रयास करता है। इसी सच्चाई को नबी-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अत्यंत संक्षिप्त और व्यापक ढंग से व्यक्त किया है:

كُلُّكُمْ رَاعٍ، وَكُلُّكُمْ مَسْؤُولٌ عَنْ رَعِيَّتِهِ

“तुममें से प्रत्येक एक चरवाहा है, और प्रत्येक से उसकी रिआया (ज़िम्मेदारी) के बारे में सवाल किया जाएगा।” (बुखारी व मुस्लिम) इस पवित्र हदीस में मानो समस्त मानव जीवन का दर्शन समाहित कर दिया गया है कि उद्देश्य, जवाबदेही, और ज़िम्मेदारी ही वे स्तंभ हैं, जिन पर एक सत्कर्मी और सफल जीवन की इमारत खड़ी होती है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *