
✍🏼मौलाना मोहम्मद सलमान दानिश
शोध छात्र, मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU)
हलाला वास्तव में कोई सुनियोजित कार्य या विधि नहीं है, बल्कि तलाक़ के एक संभावित परिणाम है। इस्लाम ने शुरू से ही दो परिवारों के बीच रिश्ते को मज़बूत और ख़ुशगवार बनाने के लिए हर संभव उपाय की अनुमति दी है।
यहाँ तक कि पराए (ग़ैर-महरम) पर नज़र डालना भी हराम था, लेकिन विवाह से पहले एक बार देख लेने की अनुमति दी गई ताकि बाद में रिश्ता पछतावे या नापसंदगी का कारण न बने। हदीस शरीफ़ में है:
हज़रत मुगीरा बिन शो’बा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्होंने कहा: मैंने रसूलुल्लाह ﷺ के समय में एक स्त्री से विवाह का प्रस्ताव रखा था। रसूलुल्लाह ﷺ ने पूछा: “क्या तुमने उसे देखा है?” मैंने कहा: “नहीं।” आप ﷺ ने फरमाया: “तो उसे देख लो, क्योंकि इससे तुम दोनों के बीच आपसी सामंजस्य और प्रेम होने की अधिक संभावना है।”
(सुनन नसाई, किताबुन निकाह)
फिर आपसी सहमति को अनिवार्य कर दिया गया, दीनदारी को प्राथमिकता दी गई, और विवाह के सभी नियम व शिष्टाचार निर्धारित करके वैवाहिक जीवन की शुरुआत की गई। अब स्पष्ट है कि ऐसे विवाह का स्वाभाविक माँग यही थी कि पति-पत्नी जीवनभर प्रेम, सहनशीलता और आपसी सम्मान के साथ जीवन बिताएँ और अलगाव के बारे में कभी सोचें भी नहीं। लेकिन इंसानी स्वभाव और प्रकृति में मतभेद संभव हैं। कभी-कभी सारी कोशिशों और अच्छी व्यवस्था के बावजूद रिश्ता टिक नहीं पाता। इसी स्थिति के लिए शरीअत ने तलाक़ और ख़ुला दोनों के रास्ते रखे, मगर तलाक़ को “सबसे घृणित जायज़ काम” कहा गया यानी जायज़ तो है, लेकिन सबसे नापसंद किया जाने वाला काम बताया गया।
इस्लाम ने तलाक़ का भी एक व्यवस्थित विधान बताया कि पति पत्नी के पाकी (तहारत) के समय में एक तलाक़ दे, क्योंकि मासिक-धर्म के दौरान औरत का स्वभाव सामान्यतः चिड़चिड़ा रहता है और पति को भी उस हालत में कुछ कड़वाहट महसूस होती है। जबकि पाकी की हालत में रुझान और लगाव बना रहता है। ऐसी स्थिति में तलाक़ देना इस बात का संकेत है कि निर्णय भावनात्मक नहीं, बल्कि सोच-समझकर और मजबूरी में लिया गया है।
तलाक़ के बाद शरीअत की अपेक्षा यही होती है कि दोनों अपने-अपने रास्ते अलग कर लें, क्योंकि रिश्ता निभाने की हर संभव कोशिश पहले ही की जा चुकी होती है। साथ ही यह कि औरत दोबारा पत्नी बनकर उस लापरवाह मर्द के पास न जाए, जिसने पहले ही उसके साथ न्याय और वफ़ादारी का धर्म नहीं निभाया हो।
इसी विवेक को ध्यान में रखकर शरीअत ने तीन तलाक़ के बाद पति-पत्नी को फिर से विवाह करने की अनुमति नहीं दी, ताकि तलाक़ को क्षणिक क्रोध या तुच्छ गुस्से का खेल न बनने दिया जाए। इस्लाम ने पुरुष को तीन तलाक़ का अधिकार इसलिए दिया था कि वह मजबूरी के हालात में, ठंडे दिमाग से इस अधिकार का उपयोग करे। किंतु जब वह अपने इस अधिकार का दुरुपयोग करके उसे व्यर्थ गँवा देता है, तो शरीअत उसके लिए सज़ा के तौर पर यह प्रतिबंध लगा देती है कि अब वह अपनी पूर्व पत्नी से दोबारा विवाह नहीं कर सकता।
हालाँकि पुरुष के लिए अपनी तीन तलाक़ वाली पूर्वxkr पत्नी से दोबारा विवाह करने के लिए यह शर्त नहीं रखी गई कि उसे पहले किसी दूसरी स्त्री से विवाह करना पड़े, फिर तलाक़ हो जाए, उसके बाद पहली पत्नी से विवाह जायज़ हो जाए (जैसी शर्त स्त्री के मामले में है)। इसके तीन प्रमुख कारण हैं:
पहला, पुरुष के लिए विवाह कोई दंड नहीं, बल्कि स्वाभाविक प्रवृत्ति है; वह वैसे भी नए विवाह की ओर अग्रसर रहता है।
दूसरा, यदि उस पर दूसरा विवाह अनिवार्य कर दिया जाता, तो उसके ऊपर नया मेहर और नया आर्थिक बोझ भी पड़ता, जो शरीअत के संतुलन और न्याय के विरुद्ध होता।
तीसरा, यदि पहली पत्नी से पुनः विवाह वैध होने के लिए पुरुष पर भी किसी दूसरी स्त्री से विवाह करने की शर्त लगा दी जाए, तो दो ही संभावनाएँ बनती हैं या तो वह दूसरी स्त्री को पहली पत्नी से विवाह करने से पहले तलाक़ दे देगा, या दूसरी स्त्री को तलाक़ दिए बिना ही पहली पत्नी उसके लिए वैध हो जाएगी।
पहली स्थिति में दूसरी पत्नी पर अन्याय होगा , क्योंकि केवल पहली पत्नी से विवाह का रास्ता बनाने के लिए उसे तलाक़ दे दिया गया।
दूसरी स्थिति में पहली पत्नी को अपमान और मन-दुख होगा कि अब उसकी सौतन मौजूद है, और जो पहले इस पति की एकमात्र पत्नी थी, अब उसे उसी पति की दूसरी पत्नी बनना पड़ेगा।
किंतु, पहले पति से तलाक़ के बाद स्त्री के लिए केवल एक ही रास्ता बचता है कि वह किसी दूसरे पुरुष से विवाह करे। अगर संयोग से उस दूसरे पति के साथ भी निभाव न हो सके और तलाक़ हो जाए, या दूसरे पति की मृत्यु हो जाए, तो अब शरीअत ने उस स्त्री पर दया करते हुए दो नए विकल्प दिए हैं:
- पहला विकल्प: वह किसी तीसरे पुरुष से निकाह करे और पवित्रता व संयम के साथ जीवन बिताए।
- दूसरा विकल्प: अब वह अपने पहले पति से भी दोबारा निकाह कर सकती है। उस समय पहले पति से निकाह पूरी तरह वैध और जायज़ होता है—और यही परिणाम “हलाला” कहलाता है।
संक्षेप यह है कि “हलाला” कोई सुनियोजित कार्य या प्रक्रिया का नाम नहीं है। जिन लोगों ने इसे योजना बनाकर किया, उन पर रसूलुल्लाह ﷺ ने लानत फरमाई है: “अल्लाह की लानत है हलाला कराने वाले पर और उस पर जिसके लिए हलाला कराया जाए।”
हलाला तलाक़ के बाद पैदा होने वाली परिस्थितियों का शरीयत के अनुसार एक स्वाभाविक परिणाम है। यह औरत के लिए कष्ट या सजा नहीं, बल्कि राहत और दया का पहलू है कि अब वह अपने पहले पति से भी विवाह कर सकती है। दूसरे पति से तलाक़ हो जाए या उसकी मृत्यु के बाद विधवा हो जाने पर भी औरत को एक अतिरिक्त विकल्प (पहले पति से पुनर्विवाह) मिल जाना उसके लिए दया और सुविधा है, यातना बिल्कुल नहीं।
