वंदे मातरम् विवाद: इस्लाम, संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता की रोशनी में पूरा सच

मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी

✍️ मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी 

(निदेशक: अल-ग़ज़ाली इंटरनेशनल स्कूल (जीआईएस), अररिया, बिहार)

इस संसार में कोई व्यक्ति किसी विशेष धर्म का अनुयायी होता है और कोई खुद को किसी भी धार्मिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ नहीं मानता, लेकिन इस मतभेद के बावजूद एक मूलभूत मूल्य सभी को मानवता के बंधन में बाँधता है और वह है धर्मों का सम्मान। इसलिए किसी के धार्मिक झुकाव, उसकी पूजा-उपासना, उसके विश्वासों और उसके आध्यात्मिक मार्ग का सम्मान करना वास्तव में मनुष्य के अपने चेतना की विशालता और आंतरिक परिपक्वता का प्रमाण है।

इसके अलावा, जब मनुष्य व्यापक परिप्रेक्ष्य में साझा समाज को देखता है तो वह यह सत्य पाता है कि हर धर्म अपने मानने वालों के लिए भलाई, शांति और नैतिकता का स्रोत होता है। इसी तरह, जो लोग किसी धर्म से जुड़े नहीं होते, वे भी मानवीय गरिमा, विचार की स्वतंत्रता और आपसी सम्मान को मूलभूत मूल्य मानते हैं। इसलिए एक जागरूक मनुष्य, चाहे वह धर्म का अनुयायी हो या न हो, यह समझता है कि धर्मों की निंदा करना वास्तव में मानवीय शिष्टता और साझा समझ की नकार है। इस दृष्टिकोण से सभी धर्मों की महत्ता और सम्मान करना केवल सामाजिक आवश्यकता नहीं बल्कि बुद्धि और तर्क दोनों की मांग है और उच्च मानवीय सभ्यता का सबसे चमकदार शीर्षक भी।

इस प्रस्तावना का बिल्कुल भी यह अर्थ नहीं है कि जब एक जागरूक मनुष्य अन्य धर्मों का सम्मान करता है, तो वह उनके विश्वासों, विचारों या उपासना-पद्धतियों को अनिवार्य रूप से सत्य मानता हो या उनका अनुसरण करता हो। सम्मान का सच्चा अर्थ तो यह है कि मतभेदों के रहते हुए भी मनुष्य दूसरे के विश्वास की स्वतंत्रता और विचार की स्वतंत्रता को पूरी तरह स्वीकार करे न कि उसके विचारों को अपना समझकर अंधानुकरण करे। इस प्रकार एक मुस्लिम, हिंदू, सिख, ईसाई या नास्तिक व्यक्ति अपने-अपने दार्शनिक एवं विश्वास-आधारित ढांचे पर दृढ़तापूर्वक कायम रहते हुए भी दूसरों के चुने हुए मार्ग का सम्मान कर सकता है। ऐसा सम्मान वैचारिक एकरूपता या समन्वय की मांग नहीं करता; यह तो नैतिक उदारता और सभ्यतापूर्ण शालीनता का प्रतीक होता है। यही वह परिपक्व और प्रौढ़ दृष्टिकोण है जो समाज में शांति, सहिष्णुता तथा पारस्परिक सम्मान की नींव को अटूट बनाता है।

इस्लाम ने धर्मों के सम्मान के इस विचार को अत्यंत स्पष्ट, न्यायपूर्ण तथा सैद्धांतिक ढंग से व्यक्त किया है। क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला का इरशाद हैः “तुम उन देवताओं को बुरा न कहो जिन्हें ये लोग अल्लाह के अलावा पुकारते हैं।” (सूरह अल-अनआमः 108) यह आदेश इसलिए दिया गया है ताकि पारस्परिक सम्मान बना रहे और दिलों में दुश्मनी न पैदा हो। इसी प्रकार क़ुरआन का यह सैद्धांतिक ऐलान कि “तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन और मेरे लिए मेरा दीन।” (सूरह अल-काफिरूनः 6) इस बात का प्रमाण है कि इस्लाम मतभेद के बावजूद दूसरों के धार्मिक चुनाव को स्वीकार करता है। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत (परंपरा) भी इसी नैतिक शिक्षा की उज्ज्वल उदाहरण है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मदीना में विभिन्न धर्मों के लोगों के साथ न्याय, सद्भावना और सम्मान का व्यवहार किया तथा यहां तक फरमायाः “जिसने किसी ग़ैर-मुस्लिम (ज़िम्मी) को कष्ट पहुंचाई, उसने मुझे कष्ट पहुंचाई।” (नसाई)

इन नुसूस (ग्रंथों) से स्पष्ट है कि इस्लाम ने धर्मों के सम्मान को न केवल नैतिक उत्तरदायित्व ठहराया है, बल्कि इसे सामाजिक शांति और मानवीय गरिमा की मूलभूत शर्त भी बताया है।

इस संदर्भ में भारत में “वंदे मातरम्” पढ़ने के मुद्दे को समझना अत्यंत सरल है। यह कविता अपने साहित्यिक तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बावजूद एक स्पष्ट धार्मिक पक्ष भी रखती है, क्योंकि इसमें राष्ट्र को देवी के पद तक ऊँचा उठाकर उसके सामने नमन करने तथा भक्ति प्रकट करने की कल्पना मौजूद है। जिन धर्मों में ऐसे विश्वास पहले से विद्यमान हैं, उनके अनुयायियों के लिए इस कविता को पढ़ना कोई विरोधाभास उत्पन्न नहीं करता, क्योंकि यह उनके धार्मिक दृष्टिकोण का हिस्सा है। किंतु मुसलमान, जो केवल एक ईश्वर को ही उपास्य मानते हैं और उपासना, सजदा तथा दिव्यता की श्रद्धा को केवल अल्लाह के लिए विशेष रखते हैं, वे इस कविता को धार्मिक आधार पर नहीं पढ़ सकते। इससे न देशप्रेम में कोई कमी आती है और न राष्ट्रीय निष्ठा पर कोई प्रभाव पड़ता है, बल्कि यह केवल इस बात की अभिव्यक्ति है कि प्रत्येक समुदाय अपनी धार्मिक सीमाओं के भीतर रहते हुए ही किसी वस्तु की भक्ति तथा उपासना का निर्धारण करता है। यही सैद्धांतिक तथा तार्किक आधार है जिससे यह सम्पूर्ण मुद्दा अत्यंत सुगमता से समझ में आ जाता है।

इस मुद्दे को एक अन्य उदाहरण से अत्यंत सुगमता से समझा जा सकता है कि यदि किसी मुसलमान को “वंदे मातरम्” पढ़ने पर बाध्य किया जाए तो यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी ग़ैर-मुस्लिम को कलमा पढ़ने पर बाध्य किया जाए। दोनों स्थितियों में एक व्यक्ति को उसके विश्वास के विरुद्ध कोई ऐसा कार्य करने पर विवश किया जा रहा है जो उसके धार्मिक सिद्धांतों से टकराता है। इस्लाम इस प्रकार की ज़बरदस्ती को कदापि वैध नहीं मानता, बल्कि क़ुरआन मजीद ने स्पष्ट रूप से यह सिद्धांत व्यक्त किया है कि दीन के मामले में कोई बलप्रयोग नहीं है।

चूंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, इसलिए भारतीय संविधान की दृष्टि से राज्य किसी भी विशिष्ट धर्म के विश्वास या धार्मिक प्रतीक को सभी नागरिकों पर थोप नहीं सकता। संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का मूलभूत सिद्धांत यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने, उसके विरुद्ध किसी कार्य से बचने, तथा अपने विश्वास के अनुरूप जीवन व्यतीत करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। यही कारण है कि भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे में किसी ऐसी वस्तु को अनिवार्य ठहराना जो किसी विशेष धर्म के विश्वास से जुड़ी हो, सैद्धांतिक रूप से उचित नहीं माना जाता। इस अवधारणा की मांग यह है कि राज्य सभी धर्मों के अनुयायियों को समान संरक्षण प्रदान करे और किसी को भी ऐसी उपासना, नारा या भक्ति के प्रकटीकरण पर विवश न करे जो उसके धार्मिक सिद्धांतों से टकराता हो। यही संवैधानिक तथा नैतिक आधार इस सम्पूर्ण मामले को स्पष्ट तथा न्यायपूर्ण ढंग से समझा देता है।

इस पृष्ठभूमि में जो व्यक्ति मुसलमानों को “वंदे मातरम्” पढ़ने पर विवश करने की बात करते हैं, वे न केवल नैतिक रूप से अनुचित व्यवहार अपनाते हैं बल्कि संवैधानिक दृष्टि से भी भूल के दोषी होते हैं। इसलिए इस कविता को बलपूर्वक पढ़वाने का प्रयास करना वास्तव में धर्मनिरपेक्ष भारत के संवैधानिक ढांचे के विरुद्ध कार्य है तथा सैद्धांतिक व कानूनी रूप से ऐसा व्यवहार निंदनीय और संवैधानिक परिधि में अपराध के समान है।

इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि इस मुद्दे को तार्किक, संवैधानिक तथा नैतिक आधारों पर देशवासियों को समझाएँ। जब वार्तालाप तर्क, शिष्टता तथा सम्मान के साथ किया जाएगा तो हृदयों में कोमलता उत्पन्न होगी और भ्रांतियाँ स्वतः दूर हो जाएँगी। इस आचरण से यह आशा की जा सकती है कि देश का एक बड़ा न्यायप्रिय वर्ग मुसलमानों के दृष्टिकोण को समझेगा और उनकी समर्थन में आवाज़ भी उठाएगा। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार पारस्परिक सम्मान तथा तर्क-आधारित संवाद न केवल धार्मिक समन्वय को सुदृढ़ करेगा बल्कि भारत को वास्तविक अर्थों में प्रगति, एकता तथा शांति के पथ पर भी आगे बढ़ाएगा।

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