जिज़्या (टैक्स)
आज के दौर में इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का एक संगठित प्रयास किया जा रहा है। दुर्भाग्य की बात यह है कि ऐसे लोग भी अपने आपको “इतिहासकार” और “शोधकर्ता” कहने लगे हैं जिन्होंने इतिहास का गहन अध्ययन तो दूर, मुश्किल से कुछ किताबें ही पढ़ी हों। विशेष रूप से मुस्लिम शासनकाल से संबंधित अनेक भ्रांतियाँ समाज में फैलाई जा रही हैं जो वास्तविक तथ्यों से बहुत दूर हैं।
भारत के मुस्लिम शासकों की व्यवस्था पर नज़र डालें तो एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है—लगभग हर राजवंश में उच्च पदों पर ग़ैर मुस्लिम मंत्री और अधिकारी मौजूद रहे। चाहे लोधी हों या तुग़लक़, ममलूक हों या मुग़ल—प्रमुख मंत्रियों और प्रशासकों में बड़ी संख्या हिन्दू अधिकारियों की होती थी। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या सचमुच मुस्लिम शासकों ने ज़बरदस्ती ग़ैर मुस्लिमों से जिज़्या वसूला था?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आजकल संगठित तरीके से झूठ फैलाने की कोशिशें हो रही हैं। जिज़्या (टैक्स) सरकार अपने अधीन क्षेत्रों और उन लोगों से वसूल करती थी, जिनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सरकार पर होती थी।
जिज़्या की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
जिज़्या का प्रचलन इस्लाम ने शुरू नहीं किया था, बल्कि पाँच सौ साल ईसा पूर्व भी इसका अस्तित्व यूनानियों में मिलता है। ईरान के प्रसिद्ध बादशाह नौशेरवाँ ने तो इसके बाक़ायदा नियम बना दिए थे। भारत में भी इसी प्रकार के कर पहले से मौजूद थे।
प्रो. खलीक अहमद निज़ामी लिखते हैं:
“ऐतिहासिक साक्ष्यों से साबित है कि इस्लाम से पहले ही ‘जिज़्या’ शब्द प्रचलित था और नौशेरवाँ आदिल ने इसके नियम बना दिए थे। ईरान और रोम में इस तरह के टैक्स लिए जाते थे। अरब के जो इलाके उनके अधीन थे, वे भी इन टैक्सों से परिचित थे। भारत में कनौज का गहड़वार वंश ‘तुष्कर-दण्ड’ नाम से टैक्स वसूल करता था। टॉड ने उल्लेख किया है कि उसके समय में भी कई राजपूत रियासतें प्रति व्यक्ति एक रुपया वसूल करती थीं। इसी प्रकार फ्रांस में Hoste Tax, जर्मनी में Common Penny और इंग्लैंड में Sculage नाम से ऐसे कर प्रचलित थे।” (मासिक दारुल उलूम, मार्च 2007)
इस्लामी दृष्टिकोण से जिज़्या
इस्लाम ने जिज़्या को अन्यायपूर्ण कर के बजाय न्यायपूर्ण और संतुलित व्यवस्था में ढाल दिया। यह कर आम आदमी की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर तय किया जाता था और इतना कम होता था कि हर कोई आसानी से इसे चुका सकता था। यदि किसी की आर्थिक हालत बेहद खराब होती और वह परेशानियों में होता, तो उससे जिज़्या माफ़ कर दिया जाता था।
हज़रत उमर (रज़ि.), दूसरे ख़लीफ़ा, के एक ऐतिहासिक प्रसंग से पता चलता है कि उन्होंने एक बूढ़े यहूदी की देखभाल के लिए बैतुल माल से पेंशन निर्धारित की थी। इतना ही नहीं, यदि किसी कारणवश इस्लामी राज्य अपने नागरिकों की सुरक्षा देने में असमर्थ होता, तो वसूला गया जिज़्या लौटा दिया जाता था। हज़रत अबू उबैदा (रज़ि.) द्वारा लाखों दिरहम वापस कर देना इसका साक्षात प्रमाण है।
मुसलमान और ग़ैर मुस्लिम के दायित्व
अब सवाल यह है कि क्या जिज़्या हर ग़ैर मुस्लिम से लिया जाता था और क्या मुसलमान इससे मुक्त थे?
असल और महत्वपूर्ण बात यह है कि हर युग और हर समय में शासन चलाने के लिए सरकार को आर्थिक और मानवीय सहयोग की आवश्यकता होती है। मज़बूत सरकार वही होती है जिसके पास रक्षा शक्ति मजबूत हो और इसके लिए धन-संपत्ति चाहिए। साथ ही सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अन्य कार्यों के लिए भी आय का स्रोत टैक्स ही होता है। यह प्रथा पहले भी थी और अब भी है।
मुस्लिम शासनकाल में हर मुसलमान के लिए अपनी कमाई का ढाई प्रतिशत ज़कात देना अनिवार्य था, इसके अलावा अन्य दान और ज़रूरत पड़ने पर आर्थिक सहयोग भी देना पड़ता था। इसके अतिरिक्त उन्हें फ़ौज में शामिल होना और अन्य सेवाएँ भी करनी होती थीं। जबकि ग़ैर मुस्लिमों के लिए दो विकल्प थे—या तो जिज़्या (टैक्स) अदा करें और सभी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाएँ, या फिर सरकारी सेना का हिस्सा बन जाएँ और जिज़्या देने से बचें।
इतिहास गवाह है कि जहाँ भी ग़ैर मुस्लिम सेना का हिस्सा बने, उन पर कोई टैक्स (जिज़्या) नहीं लगाया गया।
भारत में जिज़्या का स्वरूप
जहाँ तक भारत के मुस्लिम शासनकाल की बात है तो यहाँ जिज़्या वसूलने का रिवाज बहुत कम था और अधिकतर मुस्लिम बादशाहों ने इससे भी परहेज़ किया।
अतः जिज़्या (टैक्स) कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जिसे मुसलमान शासक या ख़लीफ़ा ग़ैर मुस्लिमों की बेइज़्ज़ती या अपमान के लिए वसूल करते हों, बल्कि यह एक आवश्यक टैक्स था जो शासन और जनकल्याण के लिए लिया जाता था। मगर आज कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए इसकी गलत व्याख्या कर रहे हैं और समाज में भाईचारे को तोड़ने तथा नफ़रत फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।

