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	<title>इस्लाम धर्म</title>
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	<description>इस्लाम -जीवन का मार्गदर्शक</description>
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	<title>इस्लाम धर्म</title>
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		<title>बच्चों की सही परवरिश: इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार बच्चों का पालन-पोषण और नैतिक विकास</title>
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		<dc:creator><![CDATA[असजद उकाबी अनुवादक अर्शद अली]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 Jan 2026 10:12:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अक़ाइद व ईमानियात]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
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					<description><![CDATA["इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार बच्चों की सही परवरिश कैसे करें? माता-पिता की ज़िम्मेदारी, नबी ﷺ का तरीका, नैतिक विकास और दीन की मजबती की पूरी गाइड।"]]></description>
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									<p>बच्चों के पालन-पोषण का विषय उन महत्वपूर्ण विषयों में से है, जिनसे समाज की पहचान और राष्ट्र व समुदाय के उत्थान व पतन की कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। यह इतना संवेदनशील विषय है कि इसमें थोड़ी सी भी ढील बच्चों को राह से विचलित और गुमराह कर सकती है। जिस तरह एक वास्तुकार एक भव्य और सुंदर भवन बनाने से पहले दृढ़ और टिकाऊ नींव पर अधिक जोर देता है, उसी तरह उच्च चरित्र और उज्ज्वल भविष्य के लिए बच्चों के उत्कृष्ट पालन-पोषण पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि भवन की नींव दुर्बल और अस्थिर हो तो उस पर भव्य और स्थायी निर्माण की कल्पना करना असंभव है। ठीक इसी तरह यदि छोटे बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा और पालन-पोषण अपर्याप्त और अस्थिर हो तो उज्ज्वल भविष्य की आशाएँ धुंधली और मंद हो जाती हैं।</p><p>बच्चों के पालन-पोषण की पहली उत्तरदायित्व माता-पिता की होती है। बच्चा जब आँखें खोलता है, तो उसे ऐसे मार्गदर्शक और शिक्षक की आवश्यकता होती है जो उसका हाथ थामकर चलना सिखाए, हर कदम पर मार्गदर्शन करे और उसे सीधे मार्ग पर चलने वाला बनाए। जीवन के इस चरण में बच्चे के लिए माता-पिता ही सब कुछ होते हैं। वे जैसा मार्गदर्शन करते हैं और जो सिखाते हैं, ठीक वैसी ही बातें बच्चों के हृदय और मस्तिष्क पर अंकित होती चली जाती हैं। कारण यह है कि उनके हृदय स्वच्छ और पारदर्शी दर्पण की तरह निर्मल होते हैं तथा वे उन सुंदर और चमकदार मोतियों जैसे होते हैं जो किसी भी चित्र या आकृति से पूरी तरह खाली होते हैं, और एक चित्रकार जैसा चाहे उन पर चित्रांकन कर सकता है। इसलिए शुरू से ही उनकी सही पालन-पोषण की जाए, उन्हें उत्तम नैतिक गुणों से सुसज्जित किया जाए, शिक्षा के आभूषण से सजाया जाए, उनके हृदयों को भलाई और नेकी की ओर झुकाया जाए, दुनिया और आख़िरत (परलोक) की सुख-समृद्धि तथा पुरस्कारों से अवगत कराया जाए। उन्हें केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए लाभदायक बनाया जाए।</p><p>माता-पिता की लापरवाही और अपर्याप्त शिक्षा तथा पालन-पोषण के कारण बच्चा विभिन्न सामाजिक बुराइयों में ग्रस्त हो जाता है, जिससे वह मार्गभ्रष्टता का शिकार हो जाता है। उदाहरण के लिए, बच्चे को पूरी स्वतंत्रता दे देना कि जहाँ चाहें जाएँ, जिसके साथ चाहें उठें-बैठें, मोबाइल या लैपटॉप आदि दे देना और इस पर निगरानी न करना कि वह उनका उपयोग किस प्रकार कर रहा है—सकारात्मक या नकारात्मक। स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में उसका संपर्क दोनों प्रकार के बच्चों से होगा, अर्थात् अच्छे भी और बुरे भी। और बचपन में जैसी संगति मिलती है, वैसी ही आदतें और स्वभाव बाद की ज़िंदगी में प्रकट होते हैं।</p><p>सुधार और पालन-पोषण के लिए सबसे मूलभूत वस्तु, जो बच्चों के पालन-पोषण तथा तैयारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और एक उचित नैतिक शिक्षा की नींव मजबूत करने की गारंटी होती है, वह एक शुद्ध और पवित्र नैतिक वातावरण है। यदि वह परिवार जिसमें बच्चा आँखें खोलता है, इस्लामी शिक्षाओं पर अमल करने वाला हो, उसके माता-पिता इस्लामी जीवन का आदर्श प्रस्तुत करते हों, तो उनकी शिक्षा के प्रभाव जीवन भर रहते हैं। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि पहले अपने घरों का वातावरण अच्छा बनाएँ और ऐसी वातावरण तैयार करें जिसमें पलने वाले बच्चे नैतिकता और चरित्र के आदर्श बन जाएँ। यदि पहले स्वयं की सुधार नहीं करेंगे तो कितनी भी कोशिश करें, वह व्यर्थ होगी। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के शिक्षा-पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि आप ने अपने साथियों को जो-जो बात सिखाई, उसका स्वयं व्यावहारिक आदर्श प्रस्तुत किया।</p><p>पालन-पोषण के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी विचारणीय है कि बच्चों के साथ सदैव करुणा और प्रेम का व्यवहार किया जाए, प्रेम तथा कोमलता से पेश आया जाए; क्योंकि प्रेम की भाषा शीघ्र ही हृदय में उतर जाती है। कठोरता से बचाव करें, क्योंकि यह घृणा और विद्रोह का कारण बन सकती है। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम बच्चों के पालन-पोषण में विशेष रूप से करुणा, प्रेम, उत्तम व्यवहार तथा कोमलता और बुद्धिमत्ता से भरे ढंग का विशेष ध्यान रखते थे। इस संबंध में हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं: मैंने दस वर्ष तक नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम की सेवा में बिताए, आप ने कभी किसी बात पर मुझे “उफ़” तक नहीं कहा, न कभी मुझ पर क्रोधित हुए और न कभी डाँटा-फटकारा। बल्कि किसी काम को करने पर यह नहीं फरमाया कि “यह काम तूने क्यों किया?” और न करने पर यह नहीं फरमाया कि “यह क्यों नहीं किया?” आप चरित्र और नैतिकता में सभी लोगों से सर्वोत्तम और श्रेष्ठ थे। (सहीह बुख़ारी:1973, सहीह मुस्लिम: 2330, शमाइल तिरमिज़ी)</p><p>दूसरा चरण बच्चे की शिक्षा का आता है। इस चरण में भी माता-पिता का उत्तरदायित्व है कि वे सर्वप्रथम दीन की शिक्षा का प्रबंध करें। इसके लिए ऐसी शिक्षण संस्था का चयन करें जहाँ शुद्ध इस्लामी वातावरण में शिक्षा तथा पालन-पोषण का सर्वोत्तम व्यवस्था हो। ऐसी संस्था का बिल्कुल भी चयन न करें जहाँ गैर-इस्लामी वातावरण हो तथा जहाँ पाश्चात्य प्रभावों का प्रभुत्व हो। कारण यह है कि ऐसा वातावरण इस्लाम से दूर ले जाता है, और यह दूरी उसे नास्तिकता तथा धर्महीनता के द्वार तक पहुँचा देती है। आज जो मुस्लिम अवनति तथा पतन का शिकार है, वह इस्लामी शिक्षाओं से दूरी के कारण ही है। अतः यह दृढ़ संकल्प करें कि हम नई पीढ़ी को इस्लामी शिक्षाओं से सुसज्जित तथा अलंकृत करेंगे और एक पूर्ण इस्लामी वातावरण की नींव डालेंगे। मुस्लिम होने के नाते हमारे लिए इस बात का जानना अत्यंत आवश्यक है कि हमारी सफलता तथा समृद्धि का आधार धार्मिक मामलों तथा धार्मिक शिक्षा से जुड़ाव में निहित है। यदि हमारा जीवन इस्लाम धर्म के बताए हुए सिद्धांतों पर चल रहा है तो संसार में भी विजय प्राप्त होगी और आख़िरत (परलोक) में भी अल्लाह तआला सर्वोत्तम प्रतिफल प्रदान करेंगे। मोमिन की जीवन का लक्ष्य केवल सांसारिक सफलता नहीं है, बल्कि दीन और दुनिया दोनों में सफल होना है।</p><p>संक्षेप यह है कि बच्चों के अच्छे या बुरे बनने में माता-पिता के पालन-पोषण तथा उनकी निगरानी का बहुत बड़ा योगदान होता है। यह माता-पिता का प्रमुख उत्तरदायित्व है कि वे अपनी संतान की धार्मिक तथा इस्लामी शिक्षा का विशेष ध्यान रखें, उन्हें बचपन से ही उत्तम नैतिकता तथा चरित्र वाला बनाएँ और दीन से उनका संबंध उनके मन-मस्तिष्क में दृढ़ता से स्थापित कर दें।</p><p dir="auto"> </p><p dir="auto">यह लेख मौलाना असद इक़बाल क़ासमी द्वारा लिखित है।</p>								</div>
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		<title>वंदे मातरम् विवाद: इस्लाम, संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता की रोशनी में पूरा सच</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 31 Dec 2025 03:01:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अक़ाइद व ईमानियात]]></category>
		<category><![CDATA[लेख]]></category>
		<category><![CDATA[#धार्मिक स्वतंत्रता]]></category>
		<category><![CDATA[#मुसलमान और वंदे मातरम्]]></category>
		<category><![CDATA[#वंदे मातरम्]]></category>
		<category><![CDATA[#वंदे मातरम् विवाद]]></category>
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					<description><![CDATA[वंदे मातरम् विवाद का पूरा सच: इस्लाम की शिक्षाएँ, भारतीय संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता के आधार पर स्पष्ट व्याख्या। जानिए क्यों मुसलमान इसे धार्मिक आधार पर नहीं पढ़ते।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[		<div data-elementor-type="wp-post" data-elementor-id="1294" class="elementor elementor-1294">
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									<p><img decoding="async" class="emoji" role="img" draggable="false" src="https://s.w.org/images/core/emoji/16.0.1/svg/270d.svg" alt="&#x270d;" /> मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी </p><p>(निदेशक: अल-ग़ज़ाली इंटरनेशनल स्कूल (जीआईएस), अररिया, बिहार)</p>								</div>
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									<p>इस संसार में कोई व्यक्ति किसी विशेष धर्म का अनुयायी होता है और कोई खुद को किसी भी धार्मिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ नहीं मानता, लेकिन इस मतभेद के बावजूद एक मूलभूत मूल्य सभी को मानवता के बंधन में बाँधता है और वह है धर्मों का सम्मान। इसलिए किसी के धार्मिक झुकाव, उसकी पूजा-उपासना, उसके विश्वासों और उसके आध्यात्मिक मार्ग का सम्मान करना वास्तव में मनुष्य के अपने चेतना की विशालता और आंतरिक परिपक्वता का प्रमाण है।</p><p>इसके अलावा, जब मनुष्य व्यापक परिप्रेक्ष्य में साझा समाज को देखता है तो वह यह सत्य पाता है कि हर धर्म अपने मानने वालों के लिए भलाई, शांति और नैतिकता का स्रोत होता है। इसी तरह, जो लोग किसी धर्म से जुड़े नहीं होते, वे भी मानवीय गरिमा, विचार की स्वतंत्रता और आपसी सम्मान को मूलभूत मूल्य मानते हैं। इसलिए एक जागरूक मनुष्य, चाहे वह धर्म का अनुयायी हो या न हो, यह समझता है कि धर्मों की निंदा करना वास्तव में मानवीय शिष्टता और साझा समझ की नकार है। इस दृष्टिकोण से सभी धर्मों की महत्ता और सम्मान करना केवल सामाजिक आवश्यकता नहीं बल्कि बुद्धि और तर्क दोनों की मांग है और उच्च मानवीय सभ्यता का सबसे चमकदार शीर्षक भी।</p>								</div>
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									<p>इस प्रस्तावना का बिल्कुल भी यह अर्थ नहीं है कि जब एक जागरूक मनुष्य अन्य धर्मों का सम्मान करता है, तो वह उनके विश्वासों, विचारों या उपासना-पद्धतियों को अनिवार्य रूप से सत्य मानता हो या उनका अनुसरण करता हो। सम्मान का सच्चा अर्थ तो यह है कि मतभेदों के रहते हुए भी मनुष्य दूसरे के विश्वास की स्वतंत्रता और विचार की स्वतंत्रता को पूरी तरह स्वीकार करे न कि उसके विचारों को अपना समझकर अंधानुकरण करे। इस प्रकार एक मुस्लिम, हिंदू, सिख, ईसाई या नास्तिक व्यक्ति अपने-अपने दार्शनिक एवं विश्वास-आधारित ढांचे पर दृढ़तापूर्वक कायम रहते हुए भी दूसरों के चुने हुए मार्ग का सम्मान कर सकता है। ऐसा सम्मान वैचारिक एकरूपता या समन्वय की मांग नहीं करता; यह तो नैतिक उदारता और सभ्यतापूर्ण शालीनता का प्रतीक होता है। यही वह परिपक्व और प्रौढ़ दृष्टिकोण है जो समाज में शांति, सहिष्णुता तथा पारस्परिक सम्मान की नींव को अटूट बनाता है।</p><p>इस्लाम ने धर्मों के सम्मान के इस विचार को अत्यंत स्पष्ट, न्यायपूर्ण तथा सैद्धांतिक ढंग से व्यक्त किया है। क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला का इरशाद हैः “तुम उन देवताओं को बुरा न कहो जिन्हें ये लोग अल्लाह के अलावा पुकारते हैं।” (सूरह अल-अनआमः 108) यह आदेश इसलिए दिया गया है ताकि पारस्परिक सम्मान बना रहे और दिलों में दुश्मनी न पैदा हो। इसी प्रकार क़ुरआन का यह सैद्धांतिक ऐलान कि “तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन और मेरे लिए मेरा दीन।” (सूरह अल-काफिरूनः 6) इस बात का प्रमाण है कि इस्लाम मतभेद के बावजूद दूसरों के धार्मिक चुनाव को स्वीकार करता है। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत (परंपरा) भी इसी नैतिक शिक्षा की उज्ज्वल उदाहरण है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मदीना में विभिन्न धर्मों के लोगों के साथ न्याय, सद्भावना और सम्मान का व्यवहार किया तथा यहां तक फरमायाः “जिसने किसी ग़ैर-मुस्लिम (ज़िम्मी) को कष्ट पहुंचाई, उसने मुझे कष्ट पहुंचाई।” (नसाई)</p><p>इन नुसूस (ग्रंथों) से स्पष्ट है कि इस्लाम ने धर्मों के सम्मान को न केवल नैतिक उत्तरदायित्व ठहराया है, बल्कि इसे सामाजिक शांति और मानवीय गरिमा की मूलभूत शर्त भी बताया है।</p><p>इस संदर्भ में भारत में &#8220;वंदे मातरम्&#8221; पढ़ने के मुद्दे को समझना अत्यंत सरल है। यह कविता अपने साहित्यिक तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बावजूद एक स्पष्ट धार्मिक पक्ष भी रखती है, क्योंकि इसमें राष्ट्र को देवी के पद तक ऊँचा उठाकर उसके सामने नमन करने तथा भक्ति प्रकट करने की कल्पना मौजूद है। जिन धर्मों में ऐसे विश्वास पहले से विद्यमान हैं, उनके अनुयायियों के लिए इस कविता को पढ़ना कोई विरोधाभास उत्पन्न नहीं करता, क्योंकि यह उनके धार्मिक दृष्टिकोण का हिस्सा है। किंतु मुसलमान, जो केवल एक ईश्वर को ही उपास्य मानते हैं और उपासना, सजदा तथा दिव्यता की श्रद्धा को केवल अल्लाह के लिए विशेष रखते हैं, वे इस कविता को धार्मिक आधार पर नहीं पढ़ सकते। इससे न देशप्रेम में कोई कमी आती है और न राष्ट्रीय निष्ठा पर कोई प्रभाव पड़ता है, बल्कि यह केवल इस बात की अभिव्यक्ति है कि प्रत्येक समुदाय अपनी धार्मिक सीमाओं के भीतर रहते हुए ही किसी वस्तु की भक्ति तथा उपासना का निर्धारण करता है। यही सैद्धांतिक तथा तार्किक आधार है जिससे यह सम्पूर्ण मुद्दा अत्यंत सुगमता से समझ में आ जाता है।</p><p>इस मुद्दे को एक अन्य उदाहरण से अत्यंत सुगमता से समझा जा सकता है कि यदि किसी मुसलमान को &#8220;वंदे मातरम्&#8221; पढ़ने पर बाध्य किया जाए तो यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी ग़ैर-मुस्लिम को कलमा पढ़ने पर बाध्य किया जाए। दोनों स्थितियों में एक व्यक्ति को उसके विश्वास के विरुद्ध कोई ऐसा कार्य करने पर विवश किया जा रहा है जो उसके धार्मिक सिद्धांतों से टकराता है। इस्लाम इस प्रकार की ज़बरदस्ती को कदापि वैध नहीं मानता, बल्कि क़ुरआन मजीद ने स्पष्ट रूप से यह सिद्धांत व्यक्त किया है कि दीन के मामले में कोई बलप्रयोग नहीं है।</p><p>चूंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, इसलिए भारतीय संविधान की दृष्टि से राज्य किसी भी विशिष्ट धर्म के विश्वास या धार्मिक प्रतीक को सभी नागरिकों पर थोप नहीं सकता। संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का मूलभूत सिद्धांत यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने, उसके विरुद्ध किसी कार्य से बचने, तथा अपने विश्वास के अनुरूप जीवन व्यतीत करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। यही कारण है कि भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढांचे में किसी ऐसी वस्तु को अनिवार्य ठहराना जो किसी विशेष धर्म के विश्वास से जुड़ी हो, सैद्धांतिक रूप से उचित नहीं माना जाता। इस अवधारणा की मांग यह है कि राज्य सभी धर्मों के अनुयायियों को समान संरक्षण प्रदान करे और किसी को भी ऐसी उपासना, नारा या भक्ति के प्रकटीकरण पर विवश न करे जो उसके धार्मिक सिद्धांतों से टकराता हो। यही संवैधानिक तथा नैतिक आधार इस सम्पूर्ण मामले को स्पष्ट तथा न्यायपूर्ण ढंग से समझा देता है।</p><p>इस पृष्ठभूमि में जो व्यक्ति मुसलमानों को &#8220;वंदे मातरम्&#8221; पढ़ने पर विवश करने की बात करते हैं, वे न केवल नैतिक रूप से अनुचित व्यवहार अपनाते हैं बल्कि संवैधानिक दृष्टि से भी भूल के दोषी होते हैं। इसलिए इस कविता को बलपूर्वक पढ़वाने का प्रयास करना वास्तव में धर्मनिरपेक्ष भारत के संवैधानिक ढांचे के विरुद्ध कार्य है तथा सैद्धांतिक व कानूनी रूप से ऐसा व्यवहार निंदनीय और संवैधानिक परिधि में अपराध के समान है।</p><p>इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि इस मुद्दे को तार्किक, संवैधानिक तथा नैतिक आधारों पर देशवासियों को समझाएँ। जब वार्तालाप तर्क, शिष्टता तथा सम्मान के साथ किया जाएगा तो हृदयों में कोमलता उत्पन्न होगी और भ्रांतियाँ स्वतः दूर हो जाएँगी। इस आचरण से यह आशा की जा सकती है कि देश का एक बड़ा न्यायप्रिय वर्ग मुसलमानों के दृष्टिकोण को समझेगा और उनकी समर्थन में आवाज़ भी उठाएगा। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार पारस्परिक सम्मान तथा तर्क-आधारित संवाद न केवल धार्मिक समन्वय को सुदृढ़ करेगा बल्कि भारत को वास्तविक अर्थों में प्रगति, एकता तथा शांति के पथ पर भी आगे बढ़ाएगा।</p>								</div>
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		<title>नीतीश कुमार हिजाब विवाद: इस्लाम में हिजाब अनिवार्य है या वैकल्पिक? धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का पूरा विश्लेषण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 21 Dec 2025 07:30:43 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इस्लामी नैतिकता]]></category>
		<category><![CDATA[#इस्लाम में हिजाब]]></category>
		<category><![CDATA[#धार्मिक स्वतंत्रता]]></category>
		<category><![CDATA[#नीतीश कुमार हिजाब विवाद]]></category>
		<category><![CDATA[#हिजाब अनिवार्य या वैकल्पिक]]></category>
		<category><![CDATA[#हिजाब विवाद 2025]]></category>
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					<description><![CDATA[नीतीश कुमार हिजाब विवाद: कुरान-हदीस की रोशनी में जानिए हिजाब इस्लाम में अनिवार्य फ़रीज़ा क्यों है। धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकार और महिला गरिमा का गहन बौद्धिक विश्लेषण]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[		<div data-elementor-type="wp-post" data-elementor-id="1280" class="elementor elementor-1280">
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									<p><img decoding="async" class="emoji" role="img" draggable="false" src="https://s.w.org/images/core/emoji/16.0.1/svg/270d.svg" alt="&#x270d;" /> मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी </p><p>(निदेशक: अल-ग़ज़ाली इंटरनेशनल स्कूल (जीआईएस), अररिया, बिहार)</p>								</div>
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									<p>इस्लामी शरीअत में आदेशों की दो मुख्य श्रेणियाँ हैं: कुछ कार्य वैकल्पिक होते हैं और कुछ अनिवार्य। वैकल्पिक कार्य वे हैं जिन्हें करने पर अल्लाह तआला की ओर से पुण्य और प्रतिफल प्राप्त होता है, किंतु यदि कोई व्यक्ति उन्हें न करे तो उस पर कोई पाप या सजा नहीं होती। उदाहरण के लिए—नफ़्ल नमाज़ें, स्वैच्छिक दान तथा अन्य प्रशंसनीय (मुस्तहब) कार्य। इसके विपरीत, कुछ आदेश ऐसे हैं जिनका पालन हर व्यस्क (बालिग़) और विवेकशील व्यक्ति पर अनिवार्य होता है; इन्हें फ़र्ज़ कहा जाता है, जैसे पाँच समय की फ़र्ज़ नमाज़ें। इन फ़र्ज़ों में कमी करना या उन्हें जान-बूझकर छोड़ना बड़ा पाप (गुनाह) है, जिससे मनुष्य अल्लाह तआला की पकड़ और दंड का पात्र बन जाता है। इस प्रकार शरीअत हमें यह शिक्षा देती है कि कहाँ उत्साह और लगन से आगे बढ़ना चाहिए और कहाँ अनुशासन तथा ज़िम्मेदारी के साथ अमल करना अनिवार्य है।</p><p>इसी पृष्ठभूमि में जब स्त्रियों के हिजाब के मुद्दे पर विचार किया जाए तो यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि हिजाब कोई वैकल्पिक कार्य नहीं, बल्कि शरीअत का अनिवार्य आदेश है जो क़ुरआन और हदीस से स्पष्ट रूप से सिद्ध है। क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला का इरशाद है:</p>								</div>
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									<p>وَقُلْ لِّلْمُؤْمِنَاتِ يَغْضُضْنَ مِنْ اَبْصَارِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوْجَهُنَّ وَلَا يُبْدِيْنَ زِيْنَتَهُنَّ اِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْـهَا ۖ وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلٰى جُيُوْبِهِنَّ ۖ وَلَا يُبْدِيْنَ زِيْنَتَهُنَّ</p>								</div>
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									<p>“और ईमान वाली स्त्रियों से कह दो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें, अपनी शर्मगाहों की रक्षा करें और अपनी ज़ीनत (सौंदर्य) को प्रकट न करें सिवाय उसके जो स्वयं प्रकट हो जाता है, तथा वे अपनी ओढ़नियाँ अपने सीनों पर डाले रखें।” (सूरह अन-नूर: 31)</p><p>इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर फरमाया गया: </p>								</div>
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									<p>يَآ اَيُّـهَا النَّبِىُّ قُلْ لِّاَزْوَاجِكَ وَبَنَاتِكَ وَنِسَآءِ الْمُؤْمِنِيْنَ يُدْنِيْنَ عَلَيْهِنَّ مِنْ جَلَابِيبِْهِنَّ ۚ ذٰلِكَ اَدْنٰٓى اَنْ يُّعْرَفْنَ فَلَا يُؤْذَيْنَ ۗ</p>								</div>
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									<p>“ऐ नबी! अपनी पत्नियों, अपनी बेटियों और ईमान वालों की स्त्रियों से कह दो कि वे अपने ऊपर अपनी चादरें लटकाया करें। ताकि उनकी पहचान हो और उन्हें तंग न किया जाए।” (सूरह अल-अहज़ाब: 59)</p><p>नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी इस आदेश की व्याख्या फरमाई। जैसा कि हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि जब यह आयत नाज़िल हुई तो अंसार की स्त्रियों ने तुरंत अपने कपड़ों से पर्दा कर लिया। (बुख़ारी)</p><p>इन क़ुरआनी आयतों और सहीह अहादीस की रोशनी में यह सच्चाई दिन की तरह स्पष्ट है कि स्त्रियों का हिजाब करना महज़ एक पसंद या सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि एक शरीई फ़रीज़ा (अनिवार्य कर्तव्य) है, जिसका पालन हर मुसलमान स्त्री पर अनिवार्य है।</p><p>इस पूरे विमर्श का सारांश यह है कि जो लोग बार-बार मुस्लिम स्त्रियों के हिजाब पर प्रश्न उठाते हैं या इसे केवल सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत पसंद का मामला समझकर हटाने की बात करते हैं, उनके विचारों को नव्यंत से चिंतन-मनन की आवश्यकता है। जब किसी कार्य की आधारभूत वजह व्यक्ति की इच्छा के बजाय एक उत्कृष्ट नैतिक एवं दैवीय आदेश पर टिकी हो, तो उसे सीमाबद्धता या दबाव के पैमाने से तौलना बौद्धिक सतहीपन के सिवा कुछ नहीं है।</p><p>हिजाब वास्तव में उस स्वतंत्रता की अवधारणा को चुनौती देता है जो मनुष्य को अपनी इच्छाओं का ग़ुलाम बना देती है, और इसके विपरीत एक ऐसी स्वतंत्रता प्रस्तुत करता है जो अंतःकरण, उद्देश्य और ज़िम्मेदारी से जुड़ी होती है। अतः इस मुद्दे को भावनाओं या पूर्वाग्रह के बजाय बौद्धिक ईमानदारी और न्याय के साथ देखने से यह सच्चाई स्पष्ट हो जाती है कि मुस्लिम स्त्री का हिजाब उसकी व्यक्तित्व को मिटाता नहीं, बल्कि उसे एक सार्थक, गरिमापूर्ण तथा नैतिक अस्तित्व में ढालता है।</p><p>यह प्रश्न उचित रूप से विचारणीय है कि आखिर किस तार्किक, वैज्ञानिक या अनुभवजन्य आधार पर यह दावा किया जा सकता है कि हिजाब प्रगति की राह में बाधा है? यदि वास्तव में हिजाब मानसिक, बौद्धिक या व्यावहारिक प्रगति में बाधक होता तो आज दुनिया के विभिन्न देशों में लाखों हिजाबी महिलाएं चिकित्सा, शिक्षा, अनुसंधान, कानून, पत्रकारिता, इंजीनियरिंग, प्रशासन और सामाजिक सेवाओं जैसे संवेदनशील एवं उच्च पदों से जुड़ी नजर न आतीं।</p><p>वास्तविकता यह है कि मानवीय प्रगति का संबंध वस्त्र से नहीं बल्कि क्षमता, परिश्रम, ज्ञान और संकल्प से होता है। हिजाब न बुद्धि को सीमित करता है, न क्षमताओं को छीनता है और न ही व्यावसायिक उत्तरदायित्वों की पूर्ति में कोई रुकावट बनता है। इसका स्पष्ट प्रमाण स्वयं वह महिला है जिसके संदर्भ में यह पूरा विषय चर्चा में आया है (जिनके हिजाब को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रमाणपत्र देते हुए खींच दिया था) कि वह एक शिक्षित डॉक्टर हैं, जो समाज की सेवा जैसे गरिमापूर्ण एवं उत्तरदायित्वपूर्ण क्षेत्र से जुड़ी हैं। यदि हिजाब वास्तव में पिछड़ेपन या स्थिरता का प्रतीक होता तो ऐसी महिलाओं का वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक क्षेत्र में प्रमुख होना संभव ही न होता।</p><p>बिहार के मुख्यमंत्री का यह कार्य केवल इस्लामी दृष्टिकोण से ही गलत नहीं, बल्कि नैतिक, सामाजिक तथा संवैधानिक स्तर पर भी अत्यंत निंदनीय एवं दंडनीय है। नैतिकता की मांग है कि किसी भी स्त्री के व्यक्तिगत वस्त्र तथा धार्मिक पहचान का सम्मान किया जाए, विशेष रूप से जब वह वस्त्र उसके ईमान, गरिमा तथा चेतन चुनाव से जुड़ा हो। किसी सत्ताधारी पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक रूप से किसी स्त्री के हिजाब को हटाना सत्ता के अनुचित उपयोग तथा नैतिक संवेदनहीनता का प्रतीक है।</p><p>इसके अतिरिक्त, भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने तथा उसकी बाहरी पहचानों को अपनाने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करता है, और इस स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करना संविधान की भावना के विरुद्ध है। यदि यही कार्य किसी ऐसी हिंदू महिला के साथ किया जाता जो घूंघट करती हों, और मुख्यमंत्री उनकी घूंघट जबरन खींच देते, तो क्या यह पूरे देश में तीव्र प्रतिक्रिया, विरोध तथा निंदा का कारण न बनता? निश्चय ही बनता, क्योंकि इसे स्त्री की इज्जत, धार्मिक स्वतंत्रता तथा व्यक्तिगत गरिमा पर आघात माना जाता। फिर यही मापदंड मुस्लिम स्त्री के हिजाब पर क्यों लागू नहीं होता? यह दोहरा मापदंड न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करता है, बल्कि अल्पसंख्यकों के विश्वास को भी आहत करता है। अतः यह मामला केवल एक घटना नहीं, बल्कि राज्य की जिम्मेदारी, संवैधानिक निष्ठा तथा नैतिक ईमानदारी का कठोर परीक्षण है, जिसमें इस कार्य को किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं ठहराया जा सकता।</p><p>मुस्लिमों को समय-समय पर <strong>ऐसे</strong> मुद्दों का सामना करना पड़ता है। इनका एक प्रभावी एवं दीर्घकालिक समाधान यह है कि देशवासियों के साथ संवाद एवं वार्ता की प्रक्रिया को स्थायी एवं गंभीर आधार पर स्थापित किया जाए। केवल प्रतिक्रिया या भावुक विरोध के बजाय दावती बुद्धिमत्ता, तर्क, सहनशीलता तथा सुंदर आचरण के साथ अपने मत को स्पष्ट करना अधिक फलदायी सिद्ध हो सकता है। जब मुद्दों को आपसी समझ एवं स्पष्टीकरण के माध्यम से समझाया जाता है तो गलतफहमियाँ कम होती हैं, पूर्वाग्रह टूटते हैं तथा विश्वास का वातावरण बनता है। इस प्रकार के व्यवहार से न केवल जटिल मामले सुलझते हैं, बल्कि देश का एक बड़ा वर्ग खुले मन से मुस्लिमों के मत को समझने तथा उनके साथ खड़े होने के लिए तैयार होता है, जो अंततः राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समन्वय तथा परस्पर सम्मान को सुदृढ़ करता है।</p>								</div>
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		<title>काफिर का वास्तविक अर्थ क्या है? इस्लाम में यह गाली क्यों नहीं है – पूरी सच्चाई</title>
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		<dc:creator><![CDATA[असजद उकाबी अनुवादक अर्शद अली]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 14 Dec 2025 09:44:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इस्लामी नैतिकता]]></category>
		<category><![CDATA[#इस्लाम]]></category>
		<category><![CDATA[#काफिर]]></category>
		<category><![CDATA[#गलतफहमी]]></category>
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					<description><![CDATA[काफिर का असली मतलब क्या है? जानिए इस्लाम और क़ुरआन के अनुसार 'काफिर' शब्द का सही अर्थ, क्यों यह गाली नहीं है और भारत में क्यों इसे गलत समझा जाता है। कुरान-हदीस के प्रमाण सहित पूरी सच्चाई।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[		<div data-elementor-type="wp-post" data-elementor-id="1271" class="elementor elementor-1271">
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									<p>हमारे देश भारत में बहुत से इस्लामी शब्दों को गलत अर्थ दे दिया गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि आम लोग और विशेष वर्ग का एक भाग भी ऐसे शब्दों से घृणा करने लगा, और धीरे-धीरे यह घृणा इस्लाम धर्म और मुसलमानों से घृणा का कारण बन गई। जबकि धर्म इस्लाम में वास्तव में ऐसी बातें नहीं मिलतीं जो दूसरे धर्म या उसके मानने वालों के अपमान का कारण बनें। धर्म इस्लाम न तो व्यवहार के स्तर पर ऐसे काम करने का समर्थक है जो इंसान के कष्ट का कारण बनें, और न ही वह अपने मानने वालों को ऐसे शब्दों के प्रयोग की अनुमति देता है जो दूसरों की भावनाओं या धार्मिक पहचान को चोट पहुँचाएँ।</p><p>जिन शब्दों को ग़लत अर्थ दिया गया है, और समय-समय पर उन पर वाद-विवाद और चर्चा होती रहती है, उनमें एक शब्द है &#8220;काफिर&#8221;। काफिर किसे कहते हैं, यह समझना बहुत आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पूरी तरह धार्मिक शब्दावली है। दुनिया का नियम है कि जब दो या उससे अधिक वस्तुओं का उल्लेख किया जाता है, तो आवश्यक होता है कि सभी को नाम दिया जाए। यहां भी यही बात है। इस्लाम धर्म की शब्दावली में काफिर उसे कहते हैं जो एक ईश्वर को मानने वाला न हो, यानी एक ईश्वर का अस्वीकार करे। काफिर के शाब्दिक अर्थ &#8220;अस्वीकार करने वाला&#8221; हैं। यहां यह बात स्पष्ट हो गई कि जो एक ईश्वर को नहीं मानता, उसे काफिर कहा जाता है।</p><p>वर्तमान काल का दुखद पहलू यह है कि, मीडिया और सोशल मीडिया पर समय बिताने वाले व्यक्ति, जो स्वयं को महान विचारक, बुद्धिजीवी और ज्ञान का सागर समझे बैठे हैं, उन्हें यह भी पता नहीं है कि काफिर शब्द का अर्थ क्या है। अपितु कई बार, सोशल मीडिया पर और राष्ट्रीय मीडिया पर देखने को मिला है कि, लोग इस तरह इस शब्द का प्रयोग करते हैं, जैसे धर्म इस्लाम ने इसके माध्यम से अपमान किया हो, या उन्हें तिरस्कार से संबोधित किया हो, जबकि ऐसा पूर्णतया नहीं है। इस्लाम की मूल शिक्षाएँ सभी लोगों के साथ न्याय, दया और अच्छा व्यवहार करने की हैं। इसलिए आवश्यक है कि ऐसे व्यक्ति जो इस शब्द को नकारात्मक समझते हैं, उन्हें इस शब्द के वास्तविक अर्थ और धर्म इस्लाम ने जिस पृष्ठभूमि में प्रयोग किया है, उस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।</p>								</div>
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					<h2 class="elementor-heading-title elementor-size-default">काफिर का अर्थ</h2>				</div>
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									<p>अरब के लोग, जो भाषा ज्ञान में अपना उदाहरण आप थे, और वाक्पटुता तथा सुंदर अभिव्यक्ति में जिनका कोई समान नहीं था, उनके लिए कुरान में कई स्थानों पर यह शब्द उपयोग किया गया है, लेकिन उन्होंने इस पर कभी आपत्ति नहीं जताई क्योंकि वे इस शब्द की वास्तविकता से भली-भाँति परिचित थे। क़ुरआन मजीद में उल्लेख है: &#8220;और हमने जब भी किसी शहर में कोई पैगंबर भेजा तो वहाँ के विलासिता में डूबे लोगों ने यही कहा कि तुम जो धर्म लेकर आए हो हम तो उसका अस्वीकार ही करते हैं।&#8221; (सूरह सबा-34)</p><p>इस आयत की व्याख्या में मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी लिखते हैं: &#8220;इस आयत में यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि क़ुरआन मजीद ने पैगंबरों को संबोधित करने वाले समुदायों की यह बात उद्धृत की है कि वे कहा करते थे कि आप जिस बात का आमंत्रण दे रहे हैं, हम उसका कुफ्र अर्थात अस्वीकार करते हैं, यानी वे स्वयं अपने आप को &#8216;काफिर&#8217; कहते थे। इससे ज्ञात हुआ कि कुफ्र या काफिर का शब्द अपमान या तिरस्कार पर आधारित नहीं है, जैसा कि आजकल गैर-मुस्लिम समुदायों की ओर से कहा जाता है; बल्कि कुफ्र के मूल अर्थ अस्वीकार के हैं। जो समुदाय तौहीद (एकेश्वरवाद) और पैगंबर के आमंत्रण को अस्वीकार कर देता है, उसे काफिर कहा जाता है। यही कारण है कि उन लोगों को स्वयं अपने आप को काफिर कहने में कोई संकोच नहीं हुआ। क़ुरआन में भी बहुत से स्थानों पर मक्का के लोगों को &#8216;काफिरों&#8217; के शब्द से संबोधित किया गया है, लेकिन कभी मक्का के लोगों को इस पर आपत्ति नहीं हुई।&#8221;</p><p>इस्लाम में &#8220;काफिर&#8221; शब्द का कहीं भी गाली के रूप में उपयोग नहीं किया गया है। बल्कि इस्लाम तो यह सिखाता है: &#8220;وَلَا تَنَابَزُوا بِالْأَلْقَابِ&#8221; यानी एक-दूसरे को बुरे नामों या उपनामों से न पुकारो। सूरह अल-हुजुरात (49:11)</p><p>इस्लाम धर्म ने हर इंसान को यह आदेश दिया है कि वह किसी दूसरे इंसान को ऐसे नाम या लक़ब से भी न पुकारे जो उसके लिए कष्ट या ठेस का कारण बने।</p><p>इसी प्रकार दूसरी स्थान पर आदेश दिया गया: &#8221; وَلَا تَسُبُّوا الَّـذِيْنَ يَدْعُوْنَ مِنْ دُوْنِ اللّـٰهِ&#8221; – अल्लाह को छोड़कर जिनकी वे पूजा करते हैं, उन्हें बुरा-भला न कहो। (सूरह अल-अनआम: 108) यानी किसी भी धर्म के बड़े लोग और धार्मिक व्यक्तित्वों के बारे में भ्रांत कथन करना और उन्हें बुरा कहने से कठोरता से निषेध किया गया है।</p><p>जब इस्लाम धर्म ने व्यक्तिगत स्तर पर और धार्मिक व्यक्तित्वों दोनों के बारे में इतने स्पष्ट शब्दों में आदेश दे दिया है कि उन्हें बुरा नहीं कहना चाहिए, तो खुद इस्लाम धर्म पर ऐसी बातों का आरोप लगाना अज्ञानता नहीं, बल्कि सुविचारित रूप से कलंकित करने का षड़यंत्र है।</p><p>हजरत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया:</p>								</div>
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									<p>لَيْسَ الْمُؤْمِنُ بِالطَّعَّانِ، وَلَا اللَّعَّانِ، وَلَا الْفَاحِشِ، وَلَا الْبَذِيءِ</p>								</div>
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									<p>&#8220;सच्चा ईमान वाला न तो व्यंग्य करने वाला होता है, न शाप देने वाला, न अश्लील बातें करने वाला और न ही गंदी वाणी का उपयोग करने वाला।&#8221; (सहीह बुखारी: 6050)</p><p>यानी एक सच्चा मुसलमान न तो बदजुबानी करता है, न लोगों को व्यंग्य करता है, न उन पर शाप भेजता है और न ही गंदी भाषा का उपयोग करता है।</p><p>मनुष्य को अल्लाह तआला ने बुद्धि प्रदान की है, और बुद्धि का सही उपयोग यह है कि हम हमेशा सकारात्मक कार्यों में इसका प्रयोग करें। यदि हमें कोई नकारात्मक बात या समाचार प्राप्त होता है, तो मूल स्रोतों और ज्ञानी व्यक्तियों से संपर्क करें।</p><p>इस्लाम धर्म एक पवित्र धर्म है, और इसके आदेश शांति और सुरक्षा स्थापित करने वाले हैं। सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया या अन्य संचार माध्यमों से जो बातें इस्लाम धर्म के बारे में कही या बताई जाती हैं, उनमें अधिकांश बातें ग़लत ढंग से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत की जाती हैं। बल्कि अनेक बार देखने में आता है कि झूठी बातों को इस्लाम धर्म की ओर जोड़ दिया जाता है और उन्हें लोगों के बीच तेज़ी से फैलाया जाता है।</p><p>शब्द &#8220;काफिर&#8221; ऐसा ही एक शब्द है, जो सामान्य अर्थ में उपयोग किया जाता है, लेकिन सुनियोजित तरीके से लोगों को इसका वास्तविक अर्थ बताने के बजाय एक कल्पित अर्थ दे दिया गया और फिर लोगों के बीच यह प्रचारित कर दिया गया कि यह &#8220;गाली&#8221; के रूप में उपयोग किया जाता है।</p><p>वास्तव में, जैसा कि क़ुरआन और हदीसों से स्पष्ट है, &#8220;काफिर&#8221; का मूल अर्थ &#8220;सत्य का इनकार करने वाला&#8221; है – यह एक धार्मिक तकनीकी शब्द है, न कि अपमान या गाली। इस्लाम सभी मनुष्यों के साथ न्याय, दया और सद्भाव का व्यवहार सिखाता है। यदि आज के संदर्भ में यह शब्द किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाता है, तो इस्लाम की शिक्षाओं के अनुसार इसे टालना ही उत्तम है, ताकि समाज में शांति और सम्मान बना रहे। ग़लतफ़हमियाँ दूर करके हम सब मिलकर एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।</p><p>इसी तरह &#8220;जिहाद&#8221; से जुड़ी ग़लतफ़हमियों को दूर करने के लिए मेरी पिछली पोस्ट पढ़ें: [<a href="https://islamdharm.info/%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%b8%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%ad%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%81/">लिंक यहाँ</a>]</p>								</div>
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		<title>जिहाद : सच्चाई, भ्रांतियाँ और इस्लाम की असली तस्वीर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[असजद उकाबी अनुवादक अर्शद अली]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 07 Dec 2025 23:54:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इस्लामी नैतिकता]]></category>
		<category><![CDATA[#Jihad in Islam]]></category>
		<category><![CDATA[#इस्लाम और आतंकवाद]]></category>
		<category><![CDATA[#कुरान में जिहाद]]></category>
		<category><![CDATA[#जिहाद की हकीकत]]></category>
		<category><![CDATA[#मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी]]></category>
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					<description><![CDATA[जिहाद आतंकवाद नहीं है! कुरान-हदीस की रोशनी में मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी साहब बताते हैं जिहाद की असली हकीकत, इस्लाम की शांति की शिक्षा और दुनिया के दोहरे मापदंड की सच्चाई। जरूर पढ़ें। (149 अक्षर)]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[		<div data-elementor-type="wp-post" data-elementor-id="1250" class="elementor elementor-1250">
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									<p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif; mso-bidi-language: HI;">मनुष्य की एक कमजोरी यह है कि जो बात उससे बार-बार कही और दोहराई जाती है</span><span style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif; mso-bidi-language: HI;">वह उस पर विश्वास कर लेता है</span><span style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif; mso-bidi-language: HI;">चाहे वह बात कितनी भी सत्य के विरुद्ध क्यों न हो।</span> <span lang="HI" style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif; mso-bidi-language: HI;">इसका एक उदाहरण इस समय “जिहाद” के नाम पर फैलाई जा रही भ्रांतियाँ हैं</span><span style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif; mso-bidi-language: HI;">जो एक राष्ट्रीय संगठन के अध्यक्ष के वक्तव्य के बाद मीडिया में बड़ा मुद्दा बन गई हैं।</span></p><p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif; mso-bidi-language: HI;">पश्चिमी देशों ने अपने अत्याचारों पर पर्दा डालने और इस्लाम को कलंकित करने के लिए “जिहाद” को “आतंकवाद” का पर्याय घोषित कर दिया है और सारे विश्व में इस्लाम के विरुद्ध आतंकवाद का झूठा अभियान चला रहे हैं।</span><span lang="HI" style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif; mso-bidi-language: HI;">इज़राइल फिलिस्तीन की भूमि पर कब्जा जमाए बैठा है</span><span style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif; mso-bidi-language: HI;">फिलिस्तीनी शरणार्थियों को अपने घर लौटने का अधिकार नहीं दिया जा रहा और स्वयं यहूदी कॉलोनियाँ बसाई जा रही हैं। इज़राइल के वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू रक्तपिपासु स्वभाव के व्यक्ति हैं और उन्होंने निहत्थे अरबों का नरसंहार किया है।</span> <span lang="HI" style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif; mso-bidi-language: HI;">इन सबके होते हुए भी उन्हें आतंकवादी नहीं कहा जाता</span><span style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif;">, </span><span lang="HI" style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif; mso-bidi-language: HI;">लेकिन जब फिलिस्तीनी इन अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष करते हैं तो उनके रक्षात्मक कार्यों को आतंकवाद कहा जाता है।<br /></span></p><p>हमारे अपने देश भारत में जिन शक्तियों ने खुलेआम बाबरी मस्जिद को शहीद किया, न्यायालय के आदेशों की अवहेलना की, भागलपुर, मेरठ और अनेक क्षेत्रों में मुसलमानों का नरसंहार किया, तथा गुजरात में सुनियोजित ढंग से मुसलमानों की जान-माल को तबाह किया, उन्हें आतंकवादी नहीं कहा जाता। लेकिन यदि मुसलमानों की ओर से कोई प्रतिक्रिया प्रकट होती है तो उसे आतंकवाद का नाम दे दिया जाता है।</p><p class="MsoNormal"><span lang="HI" style="font-size: 14.0pt; line-height: 115%; font-family: 'Sanskrit Text',serif; mso-bidi-language: HI;"> </span></p>								</div>
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									<p>इंडोनेशिया में पूर्वी तिमोर के अलगाववादियों ने विद्रोह किया तो उन्हें आतंकवादी नहीं कहा गया, बल्कि इंडोनेशिया को मजबूर किया गया कि वह उस क्षेत्र को आज़ाद कर दे; इसे आतंकवाद नहीं समझा गया। सूडान में दक्षिणी क्षेत्र के ईसाई विद्रोह के लिए तैयार थे तो उसे स्वतंत्रता-संग्राम का नाम दिया गया। रूस से कई ईसाई गणराज्यों ने अपनी अलगाव की घोषणा की तो उनके उस अधिकार को मान्यता दे दी गई। लेकिन चेचन्या में जब जनता के चुनाव के द्वारा एक मुस्लिम राज्य अस्तित्व में आया तो उसे आतंकवादी कहा गया और पूरा पूर्व व पश्चिम उसकी विरोध में कमर कस लिया। आखिरकार पूरी तरह अन्यायपूर्ण तरीके से उस राज्य को विश्व-पटल से मिटा दिया गया।</p><p>पश्चिम की साम्राज्यवादी शक्तियों और भारत की हिंदुत्व संगठनों ने आतंकवाद का विचित्र मापदंड तय किया है जिसमें एक ही कार्य कहीं &#8216;आतंकवाद&#8217; घोषित होता है और कहीं &#8216;आत्मरक्षा का अधिकार&#8217;, तथा इस्लाम को और अधिक कलंकित करने के लिए &#8216;जिहाद&#8217; को भी आतंकवाद से जोड़ दिया गया है। इस पृष्ठभूमि में यह बात आवश्यक है कि हम जिहाद के सही अर्थ को समझें और उन परिस्थितियों तथा अवसरों को सामने रखें जिनमें जिहाद की अनुमति दी गई है।</p><p>अरबी भाषा में “जहद” (جَہْد) का अर्थ शक्ति है, और “जुहद” (جُہْد) का अर्थ है कठिन परिश्रम या मेहनत। जिहाद का मतलब है अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध खड़ा होने के लिए अपनी सारी शक्ति लगाना और इस राह में आने वाली सभी कष्टों को खुशी-खुशी सहन करना।</p><p>यानी जिहाद एक बहुत व्यापक अर्थ वाली शब्दावली है, जिसका मूल उद्देश्य न्याय स्थापित करने की निरंतर संघर्ष करना है।</p><p>जिहाद के अनेक साधन और तरीके हैं; इनमें भाषा और कलम से संघर्ष भी जिहाद का एक बड़ा माध्यम है। इसी लिए रसूलुल्लाह ﷺ ने अत्याचारी शासक के सामने न्याय की बात कहने को सबसे श्रेष्ठ जिहाद बताया है:</p>								</div>
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									<p>أَفْضَلُ الْجِهَادِ كَلِمَةُ عَدْلٍ عِنْدَ سُلْطَانٍ جَائِرٍ</p>								</div>
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									<p>सबसे श्रेष्ठ जिहाद यह है कि अत्याचारी शासक के सामने न्याय की बात कही जाए</p><p>(इब्न माजा, हदीस नंबर: 4011)</p><p>इस युग में जिहाद का एक बहुत बड़ा साधन कलम भी है; बल्कि यह अत्यंत प्रभावशाली साधन है। यदि कोई मुसलमान अपना कलम अत्याचार को रोकने तथा दीन की रक्षा और प्रसार के लिए समर्पित कर दे, तो यह भी जिहाद में शामिल है।</p><p>आजकल अन्य संचार-साधन (रेडियो, टीवी, इंटरनेट, सोशल मीडिया आदि) भी किसी विचार के प्रचार-प्रसार और उसे प्रभावी बनाने में बहुत उपयोगी व कारगर हैं, और ये भी आध्यात्मिक/बौद्धिक जिहाद में पूरी तरह शामिल हैं।</p><p>जिहाद का सबसे अंतिम रूप हथियारबंद संघर्ष है, अर्थात अत्याचारियों के विरुद्ध बल-प्रयोग। लेकिन इसके लिए कुछ कठोर नियम और विस्तृत शर्तें हैं। ऐसा एकदम नहीं है कि जिस अन्य धर्मावलंबी पर किसी मुसलमान की दृष्टि पड़ जाए या जो उसके नियंत्रण में आ जाए, वह उसका जीवन समाप्त कर दे। यह जिहाद नहीं, बल्कि अशांति और अराजकता है।</p><p>जिहाद के संबंध में क़ुरआन ने हमें स्पष्ट रूप से बता दिया है कि केवल उन लोगों से जिहाद करो जो तुम्हें मार डालने पर कटिबद्ध और उद्यत हैं। अल्लाह का स्पष्ट आदेश है:</p>								</div>
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									<p>وَقَاتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ الَّذِينَ يُقَاتِلُونَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ</p>								</div>
				</div>
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									<p>और अल्लाह के मार्ग में उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़ते हैं, और सीमा से आगे न बढ़ो। निश्चय ही अल्लाह सीमा उल्लंघन करने वालों को प्रिय नहीं रखता।</p><p>(सूरह अल-बक़रह : 190)</p><p>इस आयत में दो प्रमुख बातें बताई गई हैं:</p><p>पहली बात यह कि जिहाद का सबसे अंतिम स्तर — जिसे कुरआन मजीद में “क़िताल” (सशस्त्र युद्ध) कहा गया है — केवल उन लोगों के विरुद्ध है जो स्वयं मुसलमानों से युद्ध पर उतारू हों। जिन लोगों के साथ मुसलमानों की संधि और शांति हो (जैसे भारत में सभी समुदाय एक संवैधानिक समझौते के तहत रहते हैं), उनके साथ सशस्त्र संघर्ष का कोई अधिकार नहीं है। दूसरे स्थान पर क़ुरआन मजीद ने इस नियम को और भी स्पष्ट शब्दों में बयान किया है। आदेश है:</p>								</div>
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									<p>لَا يَنْهَاكُمُ اللَّهُ عَنِ الَّذِينَ لَمْ يُقَاتِلُوكُمْ فِي الدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُمْ مِنْ دِيَارِكُمْ أَنْ تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوا إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ</p>								</div>
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									<p>अल्लाह तुम्हें उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करने और उनके साथ पूरा न्याय करने से नहीं रोकता, जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला। निश्चय ही अल्लाह न्याय करने वालों को बहुत पसंद करता है।</p><p>(सूरह अल-मुम्तहिना : 8)</p><p>यह आयत बिल्कुल स्पष्ट रूप से बता रही है कि जिहाद का आदेश केवल उन लोगों के विरुद्ध है जो मुसलमानों से युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार और तत्पर हों। और यह बात भी स्पष्ट है कि यदि कोई समुदाय किसी दूसरे समुदाय के साथ लड़ाई-झगड़े का पूरा इरादा करके बैठा हो, तो क्या उनसे युद्ध न किया जाए तो उनके लिए फूलों की चादरें बिछा दी जाएँगी? यानी आत्मरक्षा और प्रतिरोध तो स्वाभाविक और अनिवार्य हो जाता है।</p><p>ऊपर जिस आयत का उल्लेख किया गया है, उसमें दूसरी बहुत महत्त्वपूर्ण बात यह कही गई है कि इस्लाम युद्ध की स्थिति में भी इस बात की अनुमति नहीं देता कि मुसलमान नैतिकता और मानवता की सीमाएँ लाँघ जाएँ। इसी को क़ुरआन मजीद ने “इ’तिदा” अर्थात् “सीमा-उल्लंघन” या “अत्याचार” कहा है और बताया है कि अल्लाह अत्याचार करने वालों को प्रिय नहीं रखता।</p><p>अल्लामा इब्न कसीर रह. ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास, हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़, हसन बसरी रह. आदि से व्याख्या करते हुए लिखा है कि इसका अर्थ है:</p><ul><li>दुश्मन की लाश को क्षत-विक्षत करना,</li><li>स्त्रियों, बच्चों और वृद्धों की हत्या करना,</li><li>धार्मिक व्यक्तियों (पादरी, संन्यासी आदि) को मारना,</li><li>वृक्षों को जलाना। (तफ़सीर इब्न कसीर, खंड 1, पृष्ठ 266)</li></ul><p>रसूलुल्लाह ﷺ ने यहाँ तक रोक दिया कि किसी मनुष्य को आग में जलाकर दण्ड दिया जाए, क्योंकि यह दण्ड देने का अधिकार केवल अल्लाह को है।</p><p>मुसलमानों ने सदा इस निर्देश का पालन किया। मनुष्यों को जीते-जी जलाने की यह भयावह और अमानवीय प्रथा या तो उन ईसाई धार्मिक अदालतों (इन्क्विज़िशन) में मिलती है जो मतभेद रखने वालों को जीते-जी आग में झोंक देती थीं — यूरोप के धार्मिक और नैतिक इतिहास की पुस्तकों में इसका बहुत वर्णन मिलता है — या भारत में विधवाओं को उनके पति के साथ निरपराध होने के बावजूद बलपूर्वक जला दिया जाता था, जिसे “सती प्रथा” कहा जाता था।</p><p>दुर्भाग्य है कि झूठे संचार माध्यमों ने जिहाद के व्यापक अर्थ को केवल युद्ध तक सीमित कर दिया है और इस्लाम की ऐसी छवि बनाई गई है जिसमें सहिष्णुता, धैर्य, सहनशक्ति और अन्य धर्मवालों के साथ अच्छा व्यवहार करने की कोई जगह ही न रहे; बल्कि ऐसा दिखाया जाता है मानो वह हर गैर-मुस्लिम को तलवार से मार डालना चाहता हो। यह “जिहाद” शब्द की अत्यंत गलत और वास्तविकता के पूरी तरह विपरीत व्याख्या है, जो इस्लाम पर थोपी गई है।</p><p>वास्तव में गैर-मुस्लिमों के कुल तीन वर्ग हैं:</p><ol><li>वे गैर-मुस्लिम जो मुस्लिम देशों में रहते हैं, इन्हें “ज़िम्मी” या “अहल-ए-ज़िम्मा” कहा जाता है।</li><li>वे गैर-मुस्लिम जिनके साथ सत्ता में भागीदारी और परस्पर सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर मुसलमान एक ही देश में रहते हैं, ऐसे गैर-मुस्लिमों को इस्लामी विद्वानों ने “मुआहिद” (संधि-बद्ध व्यक्ति) कहा है।</li></ol><p>इन दोनों वर्गों से कोई जिहाद नहीं है। बल्कि रसूलुल्लाह ﷺ ने इनकी जान और माल को मुसलमानों की जान-माल के बराबर सम्मानित घोषित किया है:</p>								</div>
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									<p>دِمَاؤُهُمْ كَدِمَائِنَا وَأَمْوَالُهُمْ كَأَمْوَالِنَا</p>								</div>
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									<p>“उनका खून हमारे खून जैसा और उनका माल हमारे माल जैसा है।”</p><p>हाँ, यदि ये मुसलमानों पर अत्याचार करें तो आत्मरक्षा करना और कानून की सीमा में रहते हुए उनके अत्याचार का प्रतिकार करना वैध है। और दुनिया के हर कानून ने मनुष्य को यह आत्मरक्षा का अधिकार मान्यता दी हुई है।</p><p>जिहाद उन लोगों के विरुद्ध है:</p><ul><li>जिनके साथ मुसलमानों का कोई समझौता या संधि न हो,</li><li>जो मुसलमानों को अपने धर्म पर चलने से रोकते हों,</li><li>और उन्हें उनके मातृभूमि से बेघर करना चाहते हों,</li></ul><p>जैसा कि इस समय इज़राइल फ़िलिस्तीनियों के साथ कर रहा है। ऐसे लोगों के विरुद्ध इस्लाम ने सशस्त्र प्रतिरोध की अनुमति दी है। और यह केवल इस्लाम की बात नहीं है — दुनिया के सभी धर्मों और सभ्य क़ानूनों ने भी यह स्वीकार किया है कि जब कोई राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर अत्याचार करे तो पीड़ित राष्ट्र को आत्मरक्षा और रक्षात्मक युद्ध करने का पूरा अधिकार है।</p><p>आवश्यकता इस बात की है कि मुसलमान स्वयं जिहाद की वास्तविकता से परिचित हों, इस बात को समझने का प्रयास करें कि जिहाद क्या है? जिहाद किन समुदायों के विरुद्ध है? और जिहाद का उचित समय तथा स्थान क्या है? जिससे इस्लाम के बारे में जो भ्रांतियाँ फैलायी जा रही हैं और जो विष लोगों के मन में भरा जा रहा है, वे पूर्ण विवेक के साथ उसका उत्तर दे सकें और लोगों को विष का निवारक प्रदान कर सकें।</p><p>दुर्भाग्य कि इस्लामी साहित्य से उदासीनता और इस्लाम के बारे में अत्यधिक अज्ञानता के कारण हमारा यह हाल हो गया है कि हम दूसरों की भ्रांति तो क्या दूर करें, स्वयं ही उन प्रचारों से प्रभावित और डर जाते हैं और हमारा मन संदेहों के अंधकार में दिशाहीन हो जाता है।</p><p>हमें ऐसे संवेदनशील विषयों पर क़ुरआन और हदीस का अध्ययन करना चाहिए, पूर्वजों की रचनाओं से मार्गदर्शन लेना चाहिए और ज्ञानी विद्वानों से सही स्थिति समझने का प्रयास करना चाहिए!</p>								</div>
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		<title>हलाला: कोई योजना नहीं, सिर्फ़ एक परिणाम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मौलाना मोहम्मद सलमान दानिश क़ासमी]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 26 Nov 2025 00:49:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इस्लामी नैतिकता]]></category>
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					<description><![CDATA[हलाला कोई सुनियोजित योजना या सजा नहीं, बल्कि तीन तलाक़ के बाद शरीअत का एक स्वाभाविक परिणाम है। औरत के लिए रहमत और राहत का रास्ता, न कि ज़ुल्म। पूरा सच जानिए।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[		<div data-elementor-type="wp-post" data-elementor-id="1239" class="elementor elementor-1239">
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									<p><span style="white-space-collapse: preserve;"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d-1f3fc.png" alt="✍🏼" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /></span>मौलाना मोहम्मद सलमान दानिश</p><p>शोध छात्र, मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU)</p>								</div>
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									<p>हलाला वास्तव में कोई सुनियोजित कार्य या विधि नहीं है, बल्कि तलाक़ के एक संभावित परिणाम है। इस्लाम ने शुरू से ही दो परिवारों के बीच रिश्ते को मज़बूत और ख़ुशगवार बनाने के लिए हर संभव उपाय की अनुमति दी है।</p><p><span style="font-style: inherit; font-weight: inherit;">यहाँ तक कि पराए (ग़ैर-महरम) पर नज़र डालना भी हराम था, लेकिन विवाह से पहले एक बार देख लेने की अनुमति दी गई ताकि बाद में रिश्ता पछतावे या नापसंदगी का कारण न बने। </span><span style="font-style: inherit; font-weight: inherit;">हदीस शरीफ़ में है: </span></p><p><span style="font-style: inherit; font-weight: inherit;">हज़रत मुगीरा बिन शो’बा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि उन्होंने कहा: मैंने रसूलुल्लाह ﷺ के समय में एक स्त्री से विवाह का प्रस्ताव रखा था। रसूलुल्लाह ﷺ ने पूछा: “क्या तुमने उसे देखा है?” मैंने कहा: “नहीं।” आप ﷺ ने फरमाया: “तो उसे देख लो, क्योंकि इससे तुम दोनों के बीच आपसी सामंजस्य और प्रेम होने की अधिक संभावना है।” </span></p><p><span style="font-style: inherit; font-weight: inherit;">(सुनन नसाई, किताबुन निकाह)</span></p>								</div>
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									<p>फिर आपसी सहमति को अनिवार्य कर दिया गया, दीनदारी को प्राथमिकता दी गई, और विवाह के सभी नियम व शिष्टाचार निर्धारित करके वैवाहिक जीवन की शुरुआत की गई। अब स्पष्ट है कि ऐसे विवाह का स्वाभाविक माँग यही थी कि पति-पत्नी जीवनभर प्रेम, सहनशीलता और आपसी सम्मान के साथ जीवन बिताएँ और अलगाव के बारे में कभी सोचें भी नहीं। लेकिन इंसानी स्वभाव और प्रकृति में मतभेद संभव हैं। कभी-कभी सारी कोशिशों और अच्छी व्यवस्था के बावजूद रिश्ता टिक नहीं पाता। इसी स्थिति के लिए शरीअत ने तलाक़ और ख़ुला दोनों के रास्ते रखे, मगर तलाक़ को “सबसे घृणित जायज़ काम” कहा गया यानी जायज़ तो है, लेकिन सबसे नापसंद किया जाने वाला काम बताया गया।</p>								</div>
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									<p>इस्लाम ने तलाक़ का भी एक व्यवस्थित विधान बताया कि पति पत्नी के पाकी (तहारत) के समय में एक तलाक़ दे, क्योंकि मासिक-धर्म के दौरान औरत का स्वभाव सामान्यतः चिड़चिड़ा रहता है और पति को भी उस हालत में कुछ कड़वाहट महसूस होती है। जबकि पाकी की हालत में रुझान और लगाव बना रहता है। ऐसी स्थिति में तलाक़ देना इस बात का संकेत है कि निर्णय भावनात्मक नहीं, बल्कि सोच-समझकर और मजबूरी में लिया गया है।</p><p>तलाक़ के बाद शरीअत की अपेक्षा यही होती है कि दोनों अपने-अपने रास्ते अलग कर लें, क्योंकि रिश्ता निभाने की हर संभव कोशिश पहले ही की जा चुकी होती है। साथ ही यह कि औरत दोबारा पत्नी बनकर उस लापरवाह मर्द के पास न जाए, जिसने पहले ही उसके साथ न्याय और वफ़ादारी का धर्म नहीं निभाया हो।</p><p>इसी विवेक को ध्यान में रखकर शरीअत ने तीन तलाक़ के बाद पति-पत्नी को फिर से विवाह करने की अनुमति नहीं दी, ताकि तलाक़ को क्षणिक क्रोध या तुच्छ गुस्से का खेल न बनने दिया जाए। इस्लाम ने पुरुष को तीन तलाक़ का अधिकार इसलिए दिया था कि वह मजबूरी के हालात में, ठंडे दिमाग से इस अधिकार का उपयोग करे। किंतु जब वह अपने इस अधिकार का दुरुपयोग करके उसे व्यर्थ गँवा देता है, तो शरीअत उसके लिए सज़ा के तौर पर यह प्रतिबंध लगा देती है कि अब वह अपनी पूर्व पत्नी से दोबारा विवाह नहीं कर सकता।</p><p>हालाँकि पुरुष के लिए अपनी तीन तलाक़ वाली पूर्वxkr पत्नी से दोबारा विवाह करने के लिए यह शर्त नहीं रखी गई कि उसे पहले किसी दूसरी स्त्री से विवाह करना पड़े, फिर तलाक़ हो जाए, उसके बाद पहली पत्नी से विवाह जायज़ हो जाए (जैसी शर्त स्त्री के मामले में है)। इसके तीन प्रमुख कारण हैं:</p><p>पहला, पुरुष के लिए विवाह कोई दंड नहीं, बल्कि स्वाभाविक प्रवृत्ति है; वह वैसे भी नए विवाह की ओर अग्रसर रहता है।</p><p>दूसरा, यदि उस पर दूसरा विवाह अनिवार्य कर दिया जाता, तो उसके ऊपर नया मेहर और नया आर्थिक बोझ भी पड़ता, जो शरीअत के संतुलन और न्याय के विरुद्ध होता।</p><p>तीसरा, यदि पहली पत्नी से पुनः विवाह वैध होने के लिए पुरुष पर भी किसी दूसरी स्त्री से विवाह करने की शर्त लगा दी जाए, तो दो ही संभावनाएँ बनती हैं या तो वह दूसरी स्त्री को पहली पत्नी से विवाह करने से पहले तलाक़ दे देगा, या दूसरी स्त्री को तलाक़ दिए बिना ही पहली पत्नी उसके लिए वैध हो जाएगी।</p><p>पहली स्थिति में दूसरी पत्नी पर अन्याय होगा , क्योंकि केवल पहली पत्नी से विवाह का रास्ता बनाने के लिए उसे तलाक़ दे दिया गया।</p><p>दूसरी स्थिति में पहली पत्नी को अपमान और मन-दुख होगा कि अब उसकी सौतन मौजूद है, और जो पहले इस पति की एकमात्र पत्नी थी, अब उसे उसी पति की दूसरी पत्नी बनना पड़ेगा।</p><p>किंतु, पहले पति से तलाक़ के बाद स्त्री के लिए केवल एक ही रास्ता बचता है कि वह किसी दूसरे पुरुष से विवाह करे। अगर संयोग से उस दूसरे पति के साथ भी निभाव न हो सके और तलाक़ हो जाए, या दूसरे पति की मृत्यु हो जाए, तो अब शरीअत ने उस स्त्री पर दया करते हुए दो नए विकल्प दिए हैं:</p><ul><li>पहला विकल्प: वह किसी तीसरे पुरुष से निकाह करे और पवित्रता व संयम के साथ जीवन बिताए।</li><li>दूसरा विकल्प: अब वह अपने पहले पति से भी दोबारा निकाह कर सकती है। उस समय पहले पति से निकाह पूरी तरह वैध और जायज़ होता है—और यही परिणाम “हलाला” कहलाता है।</li></ul><p>संक्षेप यह है कि “हलाला” कोई सुनियोजित कार्य या प्रक्रिया का नाम नहीं है। जिन लोगों ने इसे योजना बनाकर किया, उन पर रसूलुल्लाह ﷺ ने लानत फरमाई है: “अल्लाह की लानत है हलाला कराने वाले पर और उस पर जिसके लिए हलाला कराया जाए।”</p><p>हलाला तलाक़ के बाद पैदा होने वाली परिस्थितियों का शरीयत के अनुसार एक स्वाभाविक परिणाम है। यह औरत के लिए कष्ट या सजा नहीं, बल्कि राहत और दया का पहलू है कि अब वह अपने पहले पति से भी विवाह कर सकती है। दूसरे पति से तलाक़ हो जाए या उसकी मृत्यु के बाद विधवा हो जाने पर भी औरत को एक अतिरिक्त विकल्प (पहले पति से पुनर्विवाह) मिल जाना उसके लिए दया और सुविधा है, यातना बिल्कुल नहीं।</p>								</div>
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		<title>इस्लाम में संवाद की मर्यादा: मतभेद में शिष्टता, कोमलता और नैतिकता की शिक्षा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 12 Nov 2025 03:45:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इस्लामी नैतिकता]]></category>
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					<description><![CDATA[इस्लाम में संवाद की मर्यादा और मतभेद की शिष्टता पर कुरान-हदीस की रोशनी। बिहार चुनावों में बयानबाजी के बीच जानें कैसे नरमी, तर्क और नैतिकता ईमान की निशानी है।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[		<div data-elementor-type="wp-post" data-elementor-id="1226" class="elementor elementor-1226">
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									<p><img decoding="async" class="emoji" role="img" draggable="false" src="https://s.w.org/images/core/emoji/16.0.1/svg/270d.svg" alt="&#x270d;" /> मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी </p><p>(निदेशक: अल-ग़ज़ाली इंटरनेशनल स्कूल (जीआईएस), अररिया, बिहार)</p>								</div>
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									<p>इस्लाम ने मानव जीवन के हर पहलू के लिए जो सीमाएँ और बंधन निर्धारित किए हैं, वे वास्तव में केवल पाबंदियाँ नहीं बल्कि जीवन के संतुलन, मध्यमार्ग और सुंदर व्यवस्था की गारंटी हैं। मनुष्य जब अपनी इच्छाओं, भावनाओं और विचारों को बेलगाम छोड़ देता है तो वह स्वयं अपनी तबाही का सामान तैयार करता है, लेकिन जब वह उन्हें ईश्वरीय नियमों के अधीन लाता है तो उसकी ज़िंदगी एक सुंदर व्यवस्था में ढल जाती है, जहाँ न्याय, शांति और सुकून का वातावरण स्थापित हो जाता है। इसी दृष्टिकोण से इस्लामी सीमाएँ, मानवीय आज़ादी को खत्म नहीं करतीं बल्कि उसे दिशा प्रदान करती हैं, ताकि मनुष्य केवल पशु स्तर पर न जीए बल्कि अपनी आध्यात्मिक व नैतिक महानता को पहचाने। यही वह जीवन दर्शन है जो इस्लाम ने पेश किया है जो न अतिवाद में गुम है न कमी में, बल्कि प्रकृति और प्रकाशन के सुंदर मिश्रण से सजा है।</p><p>इस पृष्ठभूमि में जब हम इस्लाम की महान शिक्षा आदाब-ए-इख़्तिलाफ़ (मतभेद के नियम) का अध्ययन करते हैं, तो यह सच्चाई उभरकर सामने आती है कि इस्लाम ने इंसान में मौजूद विविधता और वैचारिक मतभेद को प्राकृतिक प्रक्रिया माना है। इसलिए क़ुरआन मजीद ने हमें सिखाया है कि मतभेद के बावजूद संवाद की सीमा, शिष्टाचार, तर्क और सद्भावना से भरा होना चाहिए। इसी दृष्टि से इस्लाम ने वाद-विवाद को दुश्मनी का मैदान नहीं बल्कि सत्य की अभिव्यक्ति और वास्तविकता की समझ का साधन बताया है। यही कारण है कि क़ुरआन हमें आदेश देता है:</p>								</div>
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									<p>وَجَادِلْـهُـمْ بِالَّتِىْ هِىَ اَحْسَنُ</p>								</div>
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									<p>&#8220;और उनसे ऐसे तरीक़े से बहस करो जो सबसे उत्तम हो।&#8221; (सूरह अन-नह्ल, 125)</p><p>यह आयत हमें यह पाठ पढ़ाती है कि तर्कों की लड़ाई में भी बोली का सम्मान, नीयत की पवित्रता और अभिव्यक्ति की कोमलता बनी रहनी चाहिए। इस्लाम का यही सौंदर्यपूर्ण और तार्किक पक्ष इसे महज़ एक धर्म नहीं बल्कि एक पूर्ण नैतिक जीवन-दर्शन बनाता है।</p><p>एक ओर इस्लाम की ये उज्ज्वल और संतुलित शिक्षाएँ हैं जो मतभेद की मर्यादा में सुंदर वाणी, कोमलता और तर्क की नींव पर संवाद की दावत देती हैं, वहीं दूसरी ओर दुखद सच्चाई यह है कि आज ख़ुद इस्लाम के नाम लेने वाले इन शिक्षाओं से दूर होते जा रहे हैं। मतभेद सहने का धैर्य कम होता जा रहा है और संवाद के मैदान में भावनाएँ, संकीर्णता और आरोप-प्रत्यारोप ने तर्क और शिष्टता की जगह ले ली है।</p><p>इस समय बिहार विधानसभा चुनावों में राजनीतिक बयानबाज़ी के दौरान इसका व्यावहारिक प्रदर्शन साफ़ दिख रहा है, जहाँ परस्पर सम्मान और गंभीरता के बजाय घृणा भरे वाक्य और असावधान बयान ने वातावरण को दूषित कर दिया है। यह स्थिति न केवल बौद्धिक पतन की निशानी है बल्कि इस्लामी संवाद-मर्यादा और नैतिक गरिमा के भी खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन के समान है।</p><p>दुख की बात यह है कि राजनीतिक या वैचारिक मतभेद के दौरान जब हम अपने विरोधी से कठोर और कटु स्वर में बात करते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि मतभेद अस्थायी होता है, मगर सामाजिक जीवन का सिलसिला बाद में भी बना रहता है और हम इन्हीं चेहरों के बीच रहते हैं जिनसे आज हम कड़वी बातें कर रहे हैं।</p><p>सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि कर्मों का फल सिर्फ़ इस दुनिया तक सीमित नहीं, बल्कि परलोक में भी हर शब्द और हर व्यवहार का हिसाब लिया जाएगा, क्योंकि यह मामला इंसानों के अधिकारों से जुड़ा है, जिसे अल्लाह तआला भी माफ़ी के बिना माफ़ नहीं करता।</p><p>इसलिए ज़बान की कोमलता, दिल की विशालता, और मतभेद में न्याय व नैतिकता का आँचल थामे रखना — ईमान और इंसानियत, दोनों की पहचान है।</p><p>नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इंसानी रिश्तों और संवाद की मर्यादा में सबसे बुनियादी नियम यही सिखाया है कि ज़बान को संभालकर इस्तेमाल किया जाए, क्योंकि एक शब्द भी इंसान के कर्म-पत्र को भारी या हल्का कर सकता है।</p><p>इस संबंध में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का पवित्र कथन है:</p><p>&#8220;जो व्यक्ति अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखता है, वह या तो अच्छी बात कहे या चुप रहे।&#8221; <em>(बुख़ारी)</em></p><p>यह सारगर्भित शिक्षा असल में यही पाठ पढ़ाती है कि मोमिन की ज़बान हमेशा कल्याण, सुधार और कोमलता की प्रतिनिधि हो।</p><p>अगर इंसान के शब्द किसी को दुख पहुँचाने या अराजकता पैदा करने का कारण बनें, तो मौन रहना ही सच्ची बुद्धिमत्ता और ईमान की निशानी है।</p><p>यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इस्लाम की ये शिक्षाएँ केवल मौखिक बातचीत या वाद-विवाद तक सीमित नहीं, बल्कि आधुनिक युग में सोशल मीडिया पर होने वाले संवाद पर भी पूरी तरह लागू होती हैं।</p><p>ज़बान की तरह लिखावट भी इंसान के नैतिक चरित्र और परवरिश का आईना है।</p><p>इसलिए जब सोशल मीडिया पर अशिष्टता का तूफ़ान उठता है, तो यह वास्तव में उसी संवाद-मर्यादा का उल्लंघन है जिससे क़ुरआन और सुन्नत ने सख़्ती से रोका है।</p><p>शब्द — चाहे मुँह से निकलें या उँगलियों से टाइप हों — उनका वज़न, प्रभाव और जवाबदेही एक समान है।</p><p>इसलिए ज़रूरी है कि हम डिजिटल दुनिया में भी वही गंभीरता, शिष्टाचार और नैतिक ज़िम्मेदारी अपनाएँ जो एक सभ्य और ईमानदार इंसान की शान है।</p><p>इस चर्चा का एक अत्यंत सूक्ष्म और नाज़ुक बिंदु यह भी है कि कभी शब्द नहीं बल्कि स्वर की कठोरता और आवाज़ की ऊँचाई ही अशिष्टता बन जाती है।</p><p>इंसान के स्वर का उतार-चढ़ाव उसके अंतर की स्थिति का प्रकटीकरण होता है, इसलिए इस्लाम ने संवाद में कोमलता और संतुलन को ईमान का अंग घोषित किया है।</p><p>क़ुरआन मजीद ने इस पहलू पर भी गहन प्रकाश डाला है। अल्लाह का फरमान है:</p>								</div>
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									<p>يَآ اَيُّـهَا الَّـذِيْنَ اٰمَنُـوْا لَا تَـرْفَعُـوٓا اَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوْا لَـهٝ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ اَنْ تَحْبَطَ اَعْمَالُكُمْ وَاَنْـتُـمْ لَا تَشْعُرُوْنَ</p>								</div>
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									<p>&#8220;ऐ ईमान वालो! अपनी आवाज़ें नबी की आवाज़ से ऊँची न करो, और न उनसे वैसी ज़ोर से बात करो जैसी तुम आपस में करते हो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे कर्म व्यर्थ हो जाएँ और तुम्हें ख़बर भी न हो।&#8221; (सूरह अल-हुजुरात: 2)</p><p>यह आयत केवल नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आदर की शिक्षा नहीं देती, बल्कि यह उस शाश्वत सिद्धांत को उजागर करती है कि संवाद में स्वर की कोमलता, हृदय की विनम्रता की निशानी है और आवाज़ की ऊँचाई, अहंकार और अशिष्टता के पतनकारी प्रभावों को प्रकट करती है।</p><p>संक्षेप में यह है कि इस्लाम ने इंसान की व्यक्तिगत और सामाजिक ज़िंदगी को संतुलन, गरिमा और मध्यमार्ग का प्रतीक बनाने के लिए जो शिक्षाएँ दी हैं, उनमें संवाद की मर्यादा और मतभेद की शिष्टता को विशेष स्थान प्राप्त है।</p><p>इस संदर्भ में उल्लिखित नैतिक व आध्यात्मिक संतुलन ही इस्लामी जीवन-दर्शन की असली आत्मा है, जो इंसान को बातचीत में भी इबादत का बोध प्रदान करती है।</p>								</div>
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		<title>महिला को पुरुष से आधी विरासत क्यों मिलती है?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मुफ़्ती हुज़ैफ़ा नूरी कलकत्तवी]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Nov 2025 15:02:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इस्लामी नैतिकता]]></category>
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					<description><![CDATA[इस्लाम में स्त्री को पुरुष से आधी विरासत क्यों? कुरान, ज़िम्मेदारी, न्याय और आर्थिक संतुलन की पूरी हक़ीक़त। भ्रांतियाँ दूर, सच्चाई सामने।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[		<div data-elementor-type="wp-post" data-elementor-id="1209" class="elementor elementor-1209">
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									<p dir="auto"><span class="x19la9d6 x1fc57z9 x6ikm8r x10wlt62 x19co3pv x11tp94h xfibh0p xiy17q3 x1xsqp64 x1lkfr7t xexx8yu xyri2b x18d9i69 x1c1uobl"><span class="xrtxmta x1bhl96m"><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/270d-1f3fc.png" alt="✍🏼" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /></span></span>मुफ़्ती मुहम्मद हुज़ैफ़ा नूरी कलकत्तवी <br />प्राध्यापक, अरबी विभाग दारुल उलूम हमीदिया, कोलकाता</p>								</div>
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									<p>इस्लाम पर कुछ समूहों की ओर से यह आपत्ति की जाती है कि क़ुरआन-ए-करीम ने महिला को विरासत में पुरुष से आधा हिस्सा देकर मानो पुरुष और महिला के बीच भेदभाव किया है, लेकिन जब इस्लामी विरासत-व्यवस्था को उसके सिद्धांतों और आर्थिक पृष्ठभूमि के साथ देखा जाए तो सच्चाई बिलकुल उलटी दिखती है। इस्लाम ने महिला के साथ किसी प्रकार की अन्याय नहीं की; बल्कि एक संतुलित, न्यायपूर्ण और सामाजिक ज़िम्मेदारियों के अनुरूप व्यवस्था प्रदान की है। इस्लाम का मूल सिद्धांत समानता नहीं, न्याय है। न्याय की माँग यह है कि हर व्यक्ति को उसकी ज़िम्मेदारी, स्थिति और आवश्यकता के अनुसार अधिकार दिया जाए। क्योंकि यदि ज़िम्मेदारियों के अनुसार अधिकार नहीं दिए जाएँगे तो अन्याय होगा।</p><p>यदि हम इस्लाम से पहले के समाज का ऐतिहासिक सर्वेक्षण करते हैं तो पता चलता है कि इस्लाम से पूर्व के समाजों में स्त्री को विरासत का कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। रोमन, यूनानी, हिन्दू और यहूदी सभ्यताओं में स्त्री को संपत्ति की वारिस नहीं माना जाता था, बल्कि स्वयं वह विरासत में बाँटे जाने वाले माल के रूप में समझी जाती थी। इस्लाम ने पहली बार घोषणा की कि पुरुषों की तरह स्त्रियों के लिए भी हिस्सा निर्धारित है:</p><p>अतः अल्लाह तआला फ़रमाता है:</p>								</div>
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									<p>لِّلرِّجَالِ نَصِيْبٌ مِّمَّا تَـرَكَ الْوَالِـدَانِ وَالْاَقْرَبُوْنَۖ وَلِلنِّسَآءِ نَصِيْبٌ مِّمَّا تَـرَكَ الْوَالِـدَانِ وَالْاَقْرَبُوْنَ مِمَّا قَلَّ مِنْهُ اَوْ كَثُرَ ۚ نَصِيْبًا مَّفْرُوْضًا</p>								</div>
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									<p>पुरुषों का उस माल में हिस्सा है जो माता-पिता और रिश्तेदारों ने छोड़ा हो, और स्त्रियों का भी उस माल में हिस्सा है जो माता-पिता और रिश्तेदारों ने छोड़ा हो, चाहे वह थोड़ा हो या ज़्यादा; यह हिस्सा निर्धारित है। (सूरह निसा: 07)</p><p>इस आयत के ज़रिए इस्लाम ने स्त्री को कानूनी और शरई तौर पर विरासत की हक़दार ठहराया, न कि किसी अहसान के रूप में। अब यदि कोई इसका उल्लंघन करेगा तो वह इस्लाम के क़ानूनी अपराधी होगा।</p><p>इस्लामी विधिशास्त्र के अनुसार विरासत की व्यवस्था तीन सिद्धांतों पर स्थापित है: रिश्तेदारी, निकटता और आर्थिक ज़िम्मेदारी।</p><p>यह समझना आवश्यक है कि विरासत क्यों बाँटी जाती है और विरासत के बँटवारे में इतने हिस्से क्यों रखे जाते हैं। इस्लाम धर्म में विरासत का अधिकार केवल निकट संबंध की आधार पर नहीं; बल्कि इस बात पर भी निर्भर है कि किस पर आर्थिक बोझ अधिक है। इसलिए इस्लाम में किसी को अधिक या कम हिस्सा देना लिंग की आधार पर नहीं बल्कि ज़िम्मेदारी और न्याय की आधार पर है।</p><p>इस्लामी आर्थिक सिद्धांतों के अनुसार पुरुष पर विवाह के समय महर देना अनिवार्य है। पत्नी, संतान, माता-पिता और कुछ अन्य व्यक्तियों का भरण-पोषण भी पुरुष की ज़िम्मेदारी है। जिहाद, सुरक्षा, आवास, परिवार की देखभाल और अन्य सामाजिक खर्चों की ज़िम्मेदारी भी पुरुष पर डाली गई है। इसके विपरीत स्त्री पर न महर देना अनिवार्य है, न भरण-पोषण, न किसी की देखभाल।</p><p>इसलिए जब इस्लाम पुरुष को दो हिस्से देता है और स्त्री को एक, तो यह इसलिए कि पुरुष पर दोगुना आर्थिक बोझ है।</p><p>स्त्री को जो हिस्सा मिलता है वह उसके व्यक्तिगत उपयोग और संरक्षण के लिए होता है, जबकि पुरुष को जो हिस्सा मिलता है उससे वह पूरे परिवार की देखभाल करता है। घर में मौजूद सभी स्त्रियाँ—चाहे माँ हों, बहन हों, पत्नी हों या बेटी हों—उन सब की आवश्यकताओं की पूर्ति पुरुष की ज़िम्मेदारी है।</p><p>हालाँकि विरासत में हिस्सा सभी को मिलता है, लेकिन खर्च केवल पुरुष करता है। स्त्री अपने माल की अकेली मालकिन होती है और हर प्रकार की ज़िम्मेदारी तथा देखभाल से मुक्त होती है।</p>								</div>
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					<h3 class="elementor-heading-title elementor-size-default">एक भ्रांति का निवारण</h3>				</div>
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									<p>क़ुरआन में फरमाया गया:</p>								</div>
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									<p>يُوْصِيْكُمُ اللّـٰهُ فِىٓ اَوْلَادِكُمْ ۖ لِلـذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ الْاُنْثَيَيْنِ</p>								</div>
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									<p>“अल्लाह तुम्हारी संतान के बारे में तुम्हें आदेश देता है कि एक पुरुष का हिस्सा दो स्त्रियों के बराबर है। (सूरह निसा: 10)</p><p>यह सिद्धांत वास्तव में विशिष्ट परिस्थितियों के लिए है, सभी स्थितियों में नहीं।</p><p>संक्षेप में, शरीयत में अनेक स्थितियाँ ऐसी हैं जिनमें स्त्री का हिस्सा पुरुष के मुक़ाबले समान या अधिक होता है, या स्त्री हिस्सेदार होती है और पुरुष वंचित रहता है। डॉक्टर सलाहुद्दीन सुल्तान, जो मिस्र मूल के विद्वान हैं और अमेरिका की इस्लामी यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक हैं, उन्होंने इस विषय पर ‘मीरासुल मरअ व क़ज़ियतुल मुसावात’ शीर्षक से लेखन किया है और सिद्ध किया है कि तीस से अधिक ऐसी स्थितियाँ हैं जिनमें स्त्री पुरुष के समान या उससे अधिक हिस्सा पाती है या वह अकेली हिस्सेदार होती है और पुरुष वंचित रहता है, जबकि केवल चार निश्चित स्थितियाँ हैं जिनमें स्त्री का हिस्सा पुरुष के मुक़ाबले आधा होता है। यदि इस पृष्ठभूमि में स्त्री की विरासत के मुद्दे पर विचार किया जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि यह समझना कि स्त्री को पुरुष के मुक़ाबले कम हिस्सा दिया जाता है, केवल भ्रांति है। और जिन स्थितियों में स्त्री का हिस्सा कम है, उनमें फ़र्क़ केवल कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों के आधार पर रखा गया है; बल्कि इसमें भी स्त्रियों ही की सुविधा को ध्यान में रखा गया है क्योंकि पुरुष पर पूरे परिवार की देखभाल की ज़िम्मेदारी है, स्त्री पर स्वयं अपनी देखभाल की ज़िम्मेदारी भी नहीं। इस दृष्टि से प्रत्यक्ष रूप से स्त्री का हिस्सा आधे से भी कम होना चाहिए था; लेकिन स्त्री की स्वाभाविक कमज़ोरी का ध्यान रखते हुए उसे आधे का हक़दार ठहराया गया है।</p><p>उदाहरण के लिए, यदि मृतक की संतान हो तो माँ और पिता दोनों को छठा-छठा हिस्सा मिलता है यहाँ समानता है।  यदि कोई स्त्री मृत हो जाए और केवल एक बेटी हो तो उसे आधा माल मिलता है; इस स्थिति में पुरुष का कोई हिस्सा नहीं होता।</p>								</div>
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					<h3 class="elementor-heading-title elementor-size-default">इस्लाम से पहले और बाद का तुलनात्मक अध्ययन</h3>				</div>
				</div>
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									<p>यह तुलना इस सच्चाई को और अधिक स्पष्ट कर देती है।</p><ul><li>इस्लाम से पहले स्त्री विरासत के अधिकार से वंचित थी, इस्लाम ने उसे अधिकार दिया।</li><li>पहले विरासत का बँटवारा शक्ति और पुरुष प्रभुत्व की आधार पर होता था, इस्लाम ने इसे निकटता और न्याय की आधार पर स्थापित किया।</li><li>पहले स्त्री को विरासत में भागीदार नहीं बनाया जाता था, बल्कि वह स्वयं विरासत का माल समझी जाती थी, इस्लाम ने उसे विरासत की हक़दार बनाया।</li><li>पहले स्त्री की कोई आर्थिक हैसियत नहीं थी, इस्लाम ने उसे संपत्ति की मालकिन बनाया।</li><li>पहले पुरुष को अपने बाद केवल पुत्रों के लिए माल छोड़ने का अधिकार था, इस्लाम ने पुत्रियों के लिए भी हिस्से निर्धारित किए।</li><li>पहले स्त्री के लिए विरासत में कमी नहीं बल्कि पूर्ण वंचना थी, इस्लाम ने कमी नहीं बल्कि अधिकार दिया।</li></ul><p>इस्लामी इतिहास का यह चरण मानवाधिकारों की दुनिया में एक क्रांति था। इस्लाम ने पहली बार स्त्री को इंसान के रूप में, वारिस के रूप में, मालकिन के रूप में मान्यता दी। यही इस्लाम का न्याय था जिसने कहा कि बेटी को भी विरासत मिलेगी, पत्नी को भी मिलेगी, माँ को भी मिलेगी। यहाँ तक कि यदि मृतक की केवल एक बेटी होना सिद्ध हो जाए, तो आधा माल उसका होगा, चाहे दुनिया के सारे पुरुष वारिस खड़े हों।</p><p>इस्लामी विरासत-कानून की यह बँटवारा वास्तव में सामाजिक न्याय और आर्थिक संतुलन की नींव पर है। यदि स्त्री और पुरुष को बराबर हिस्सा दिया जाए लेकिन पुरुष पर खर्च की ज़िम्मेदारी बनी रहे, तो आर्थिक असंतुलन और अन्याय उत्पन्न होगा। इसलिए इस्लाम ने पुरुष को अधिक देकर उसे अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिए सक्षम बनाया, स्त्री को कम देकर उसे आर्थिक दबाव से मुक्त रखा।</p><p>संक्षेप यह है कि इस्लाम ने स्त्री को कम नहीं दिया बल्कि न्याय के अनुसार दिया है। पुरुष के अधिक हिस्से के पीछे ज़िम्मेदारी है, श्रेष्ठता नहीं। स्त्री के कम हिस्से के पीछे संरक्षण है, वंचना नहीं। इस्लाम का यह तंत्र आज भी दुनिया के हर आर्थिक और सामाजिक विचार से अधिक निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और मानवीय स्वभाव से सामंजस्यपूर्ण है। सच्चाई यह है कि इस्लाम ने स्त्री को कम नहीं बल्कि सुरक्षित स्थान दिया, यह अंतर अत्याचार नहीं बल्कि न्याय है। सच्चाई यह है कि विरासत-व्यवस्था पर आपत्ति करने वाले वे लोग हैं जिन्होंने पूरे इतिहास में स्त्रियों को उपभोग की वस्तु से अधिक कुछ नहीं समझा, और आज भी ये लोग समानता और स्वतंत्रता के नाम पर स्त्रियों को धर्म से विमुख बनाने की कोशिश कर रहे हैं।</p>								</div>
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		<title>इस्लाम में तौबा का दर्शन: ग़लती, मग़फ़िरत और इंसानियत की नई शुरुआत</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 01 Nov 2025 14:00:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इस्लामी नैतिकता]]></category>
		<category><![CDATA[#Islamic philosophy of repentance]]></category>
		<category><![CDATA[#अल्लाह की मग़फ़िरत]]></category>
		<category><![CDATA[#इस्लाम में ग़लती और क्षमा]]></category>
		<category><![CDATA[#इस्लाम में तौबा]]></category>
		<category><![CDATA[#इस्लाम में सुधार और माफ़ी]]></category>
		<category><![CDATA[#इस्लामिक विचारधारा में तौबा]]></category>
		<category><![CDATA[#तौबा]]></category>
		<category><![CDATA[#तौबा और इंसानियत]]></category>
		<category><![CDATA[#तौबा का अर्थ]]></category>
		<category><![CDATA[#तौबा का दर्शन]]></category>
		<category><![CDATA[#तौबा की अहमियत]]></category>
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					<description><![CDATA[इस्लाम में तौबा केवल गुनाहों से मुक्ति का ज़रिया नहीं, बल्कि अल्लाह की मग़फ़िरत (ईश्वरीय क्षमा) और रूहानी सुधार का मार्ग है। यह लेख बताता है कि कैसे ग़लती इंसान की कमजोरी नहीं, बल्कि आत्म-जागरण का अवसर है।
इस्लामी शरीअत ने सज़ा के साथ-साथ सुधार, तौबा और कफ़्फ़ारा की व्यवस्था दी ताकि इंसान निराशा नहीं बल्कि उम्मीद और सुधार की राह पकड़े।
क़ुरआन और हदीस के उद्धरणों के माध्यम से यह लेख स्पष्ट करता है कि अल्लाह तौबा करने वालों से प्रेम करता है और समाज को भी चाहिए कि वह सच्चे तौबा करने वाले को सम्मान, भरोसे और प्रेम से स्वीकार करे।
यह लेख इस्लाम, तौबा, मग़फ़िरत, और इंसानियत के गहरे रिश्ते को उजागर करता है।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[		<div data-elementor-type="wp-post" data-elementor-id="1200" class="elementor elementor-1200">
						<section class="elementor-section elementor-top-section elementor-element elementor-element-b5a1fa9 elementor-section-boxed elementor-section-height-default elementor-section-height-default" data-id="b5a1fa9" data-element_type="section" data-e-type="section">
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									<p><img decoding="async" class="emoji" role="img" draggable="false" src="https://s.w.org/images/core/emoji/16.0.1/svg/270d.svg" alt="&#x270d;" /> मौलाना मुदस्सिर अहमद क़ासमी </p><p>(निदेशक: अल-ग़ज़ाली इंटरनेशनल स्कूल (जीआईएस), अररिया, बिहार)</p>								</div>
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									<p>ग़लती मनुष्य के अस्तित्व का वह अनिवार्य पहलू है जो उसकी अपूर्ण बुद्धि और सीमित समझ का प्रतीक है। उसकी रचना ही इस ढंग से हुई है कि उसके चेतन में पूर्णता की खोज तो रखी गई, किंतु उस तक पहुँचने की क्षमता को स्वतंत्र इच्छा के रूप में सौंपा गया जहाँ भूल और चूक की संभावना सदा बनी रहती है। पर यही चूक उसे विचार, पश्चाताप और तौबा (सच्चे मन से अल्लाह की ओर लौटने) के मार्ग पर ले जाती है, जो अंततः उसे आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करती है। यानी ग़लती केवल मनुष्य की कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसके अर्थपूर्ण अस्तित्व का प्रमाण भी है। क्योंकि यदि ग़लती की संभावना न होती, तो तौबा की महानता और मग़फ़िरत (ईश्वरीय क्षमा) की असीम विशालता भी प्रकट न होती। नबी-ए-करीम ﷺ ने मनुष्य की इसी स्वाभाविक प्रवृत्ति को इस ख़ूबसूरत अंदाज़ में बयान फरमाया:</p>								</div>
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									<p>&#8220;كُلُّ ابْنِ آدَمَ خَطَّاءٌ وَخَيْرُ الْخَطَّائِينَ التَّوَّابُونَ‏&#8221;‏</p>								</div>
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									<p>&#8220;हर इंसान (संभावित रूप से) ग़लती करने वाला है, और सबसे उत्तम ग़लती करने वाले वे हैं जो तौबा करने वाले हैं।&#8221; (तिरमिज़ी, हदीस नं. 2499)</p>								</div>
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									<p>यही कारण है कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अपनी पूर्ण हिकमत (ज्ञान और विवेक) से इस्लामी शरीअत को इस तरह व्यवस्थित किया कि वह न केवल मानवीय कमज़ोरियों का गहरा अहसास रखती है, बल्कि उनकी भरपाई के लिए सुव्यवस्थित, न्यायपूर्ण और दया से भरा हुआ तंत्र भी प्रदान करती है।  चूंकि इंसान से ग़लती का होना अनिवार्य है, इसलिए शरीअत ने केवल सज़ा ही नहीं बताई, बल्कि इस्लाह (सुधार), तौबा (पश्चाताप), कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) और मग़फ़िरत (क्षमा) के नियम भी निर्धारित किए ताकि सामाजिक संतुलन भी बना रहे और आध्यात्मिक पवित्रता भी सुरक्षित रहे। यदि शरीअत में सुधार के दरवाज़े बंद होते, तो इंसान निराशा और विद्रोह का शिकार हो जाता। लेकिन इस्लाम ने उसे उम्मीद, रुजू (पलटने), सुधार और बेहतरी का रोशन मार्ग दिखाया। इस प्रकार शरीअत-ए-मुहम्मदिया इंसान के ग़लती करने के बावजूद उसकी इज़्ज़त और गरिमा को सलामत रखती है, और उसे पछतावे (पश्चाताप) के ज़रिए आध्यात्मिक उन्नति की बुलंद मंज़िलों तक पहुँचने का अमूल्य अवसर प्रदान करती है।</p><p>अल्लाह तआला ने पवित्र कुरान में तौबा की महिमा को बहुत सुंदर और प्रभावशाली ढंग से बयान किया है:</p>								</div>
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									<p>اِنَّ اللّـٰهَ يُحِبُّ التَّوَّابِيْنَ وَيُحِبُّ الْمُتَطَهِّرِيْنَ</p>								</div>
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									<p>&#8220;निश्चय ही अल्लाह तौबा करने वालों से प्रेम करता है और पवित्र रहने वालों को पसंद करता है।&#8221; <em>(सूरह अल-बकरह: 222)</em></p><p>इस पवित्र आयत से स्पष्ट होता है कि तौबा केवल पाप से मुक्ति का साधन नहीं, बल्कि अल्लाह की प्रेम प्राप्ति का सच्चा मार्ग है। क्योंकि तौबा इंसान के अंदर पछतावा, ख़ुद एहतिसाब (आत्म-निरीक्षण) और इस्लाह-ए-नफ़्स (आत्म-सुधार) की भावना जगाती है जो उसे पाप के अंधकार से पुण्य के प्रकाश की ओर ले जाती है। वास्तव में यह इंसान और उसके सृष्टिकर्ता के बीच एक गहरा आध्यात्मिक संबंध है, जो बंदगी का एहसास को ताज़ा करता है, और दिल में उम्मीद और शांति की लहरें भर देता है।</p><p>यहाँ यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इस्लाम इंसान का मूल्यांकन उसके अतीत की ग़लतियों से नहीं, बल्कि उसकी नीयत, तौबा और वर्तमान सुधार (इस्लाह-ए-हाल) से करता है। जब कोई इंसान अपनी ग़लती के बाद भरपाई (तलाफ़ी) करता है और सच्चे दिल से अल्लाह की ओर लौटता है (रुजू इलल्लाह), तो वह अपनी रूह को उस गंदगी और मैल से पाक कर लेता है जो गुनाह ने उस पर डाल दी थी। इस दृष्टि से देखा जाए तो इंसान कोई स्थिर प्राणी नहीं, बल्कि गतिशील और उन्नतिशील अस्तित्व है जो गिरता ज़रूर है, मगर संभलता भी है; भटकता ज़रूर है, मगर राह पा भी लेता है। इसलिए इस्लाम इंसान को ग़लती के घेरे में कैद नहीं करता, बल्कि तौबा के ज़रिए उसे शाश्वत (अनंत) पवित्रता के मार्ग पर चला देता है। इसकी सबसे उत्तम उदाहरण यह है कि अगर कोई ग़ैर-मुस्लिम ईमान लाकर इस्लाम स्वीकार कर लेता है, तो उसके सारे पिछले गुनाह और ग़लतियाँ मिटा दी जाती हैं।</p><p>नबी-ए-अकरम ﷺ ने फ़रमाया: &#8220;इस्लाम (क़ुबूल करना) पहले के तमाम गुनाहों को मिटा देता है।&#8221; (मुस्लिम:121)</p><p>इस हदीस का अर्थ यह है कि ईमान लाने के बाद इंसान एक नई रूहानी ज़िंदगी में प्रवेश करता है जहाँ बीता हुआ अतीत मिट जाता है और एक पवित्र व उज्ज्वल अस्तित्व की नींव रखी जाती है। यह दृष्टिकोण इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि इस्लाम इंसान को अतीत के बोझ से मुक्त करके उम्मीद, सुधार और नई शुरुआत का अनमोल अवसर प्रदान करता है।</p><p>चर्चा के संदर्भ में एक कड़वी सच्चाई हमारे सामने आती है कि जहाँ इस्लाम तौबा के बाद इंसान को बिल्कुल साफ़ और निष्पाप मानता है, वहीं समाज अक्सर ऐसा नहीं करता। इंसानों की नज़र छोटी और फैसले सतही होते हैं, इसलिए वे किसी व्यक्ति की अतीत की ग़लतियों को भूल नहीं पाते। परिणामस्वरूप, वह व्यक्ति जिसने सच्चे मन से खुद को सुधार लिया और तौबा से रूहानी (आत्मिक) पवित्रता प्राप्त कर ली, वह भी कुछ लोगों की नज़र में हमेशा अपराधी ही बना रहता है। यह रवैया वास्तव में मानवीय कम-समझ और दिल की संकीर्णता का नमूना है, क्योंकि इस्लाम सिखाता है कि “जो व्यक्ति तौबा कर ले, वह ऐसा है जैसे उसने कभी गुनाह किया ही नहीं।” मगर दुख की बात है कि इंसान अल्लाह जैसा माफ़ करने वाला नहीं बनता; वह दूसरों के अतीत को उनकी पहचान बना देता है। यही वह बिंदु है जहाँ अल्लाह का न्याय और मानवीय सोच में सबसे बड़ा अंतर उजागर होता है।</p><p>याद रखिए! किसी व्यक्ति की तौबा (सच्चे पश्चाताप) के बाद भी उसे उसके अतीत की ग़लतियों के ताने देना या बार-बार उसकी ख़ता की याद दिलाना केवल नैतिक कमजोरी नहीं, बल्कि एक जवाबदेह (क़ाबिल-ए-मुआख़ज़ा) पाप है। यह काम इंसान के दिल से दया, न्याय और निष्पक्षता के भाव को छीन लेता है और समाज में बिगाड़ और नफ़रत का बीज बो देता है। जो व्यक्ति अल्लाह के माफ़ किए हुए बंदे को माफ़ नहीं करता, वह वास्तव में इलाही मग़फ़िरत (ईश्वरीय क्षमा) के प्रणाली से बग़ावत (विद्रोह) करता है। ऐसे व्यवहार का नुकसान केवल दुनिया में ही नहीं, बल्कि आख़िरत (परलोक) में भी भुगतना पड़ सकता है। इसलिए, हमारा यह पवित्र और नैतिक कर्तव्य है कि जब कोई इंसान सच्चे दिल से तौबा करे और अपनी पुरानी भूल को दोहराने से बच जाए, तो हम उसे सम्मान, भरोसे और स्नेह के साथ स्वीकार करें ताकि इस धरती पर मोहब्बत, अपनत्व और इंसानियत की भावना को बढ़ावा मिले, और समाज में रहमत और माफी की खुशबू फैल जाए।</p>								</div>
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		<title>हज़रत आयशा (रज़ि.) की निकाह की उम्र: हदीस की रोशनी में प्रमाणिक जवाब</title>
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		<dc:creator><![CDATA[असजद उकाबी अनुवादक अर्शद अली]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 31 Oct 2025 03:45:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इस्लामी इतिहास]]></category>
		<category><![CDATA[#इस्लामकीसच्चाई]]></category>
		<category><![CDATA[#इस्लामीइतिहास]]></category>
		<category><![CDATA[#निकाहकीउम्र]]></category>
		<category><![CDATA[#सहीहहदीस]]></category>
		<category><![CDATA[#हज़रत आयशा]]></category>
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					<description><![CDATA[इस पोस्ट में हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की निकाह की उम्र (6 वर्ष) और रुख़्सती (9 वर्ष) का सहीह बुख़ारी की प्रमाणिक हदीस से विस्तृत जवाब दिया गया है।
इस्लाम-विरोधियों के झूठे इल्ज़ामों, उम्र के विरोधाभास, दहाई छोड़ने की थ्योरी और ऐतिहासिक तर्कों का तथ्यों, सीरत और अरब रिवाज़ के आधार पर खंडन।
निकाह की हिकमत: धार्मिक ज्ञान का प्रसार, महिलाओं तक दीन पहुँचाना और 2,000+ हदीसों की रिवायत।
निष्कर्ष: यह निकाह नबी ﷺ की सुन्नत, समाजी रिवाज़ और इलाही योजना का हिस्सा था—कोई असामान्यता नहीं।
#हज़रतआयशा #सहीहहदीस #इस्लामीइतिहास #निकाहकीउम्र #इस्लामकीसच्चाई]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[		<div data-elementor-type="wp-post" data-elementor-id="1192" class="elementor elementor-1192">
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									<p>सच्चाई यह है कि यह विषय दरअसल किसी बहस या विवाद का नहीं है। लेकिन इस्लाम के कुछ विरोधियों ने जिस तरह इसे चर्चा और वाद-विवाद की मेज़ पर ला खड़ा किया है, उससे न केवल धर्म-ए-इस्लाम की तौहीन (अपमान) होती है, बल्कि सरवर-ए-क़ायनात, हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की पवित्र और महान हस्ती भी निशाने पर आती है।</p><p>इस विषय पर जिन लोगों ने बहस की, उनमें से अधिकांश ऐसे लोग हैं जो हक़ीक़त से मुँह मोड़कर, भोली-भाली जनता के दिमाग़ों में शंका और भ्रम पैदा करने के लिए आरोपो और झूठे इल्ज़ामों का सहारा लेते हैं। उनका वास्तविक उद्देश्य न तो मसले की तहक़ीक़ (गहराई से जांच) है, न ही सच्चाई तक पहुँचना — बल्कि लोगों में बेचैनी फैलाना और उन्हें गुमराह करना है। अब सवाल यह उठता है — निकाह (शादी) के वक़्त हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की उम्र क्या थी?</p><p>इस सवाल का सबसे सही और प्रमाणिक जवाब ख़ुद उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा (रज़ि.) ने विस्तार से बयान किया है।</p><p>इस हदीस के रावी उनके भांजे — यानी उनकी बड़ी बहन हज़रत अस्मा (रज़ि.) के सुपुत्र — हज़रत उरवा बिन ज़ुबैर (रह.) हैं। वे हज़रत आयशा (रज़ि.) के प्रिय शिष्य थे, जिन्होंने उनसे केवल एक-दो नहीं, बल्कि अनेक हदीसें रिवायत (वर्णन) की हैं, जिनकी सनद (श्रृंखला) और मतन (पाठ) पर किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं की जा सकती।</p><p>सहीह बुख़ारी में यह हदीस इन शब्दों में दर्ज है:</p>								</div>
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									<p>&#8220;عن عائشۃ: تَزَوَّجَنِي النَّبِيُّ ﷺ وَأَنَا بِنْتُ سِتِّ سِنِينَ، وَبَنَى بِي وَأَنَا بِنْتُ تِسْعٍ، وَمَكَثْتُ عِنْدَهُ تِسْعًا&#8221;</p>								</div>
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									<p>हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फ़रमाती हैं —“जब रसूलुल्लाह ﷺ ने मुझसे निकाह किया, उस समय मेरी उम्र छः साल थी, और जब मुझे रसूलुल्लाह ﷺ के पास भेजा गया (रुख़्सती हुई), तब मेरी उम्र नौ साल थी, और मैंने नौ साल रसूलुल्लाह ﷺ की रफ़ाक़त (संगत) में गुज़ारे।”</p><p>कुछ लोगों ने हज़रत आयशा की उम्र के बारे में आपत्ति उठाई है और इसके लिए जिन कारणों को आधार बनाया है, उन सभी का जवाब सीरत लेखकों और इस्लामी विद्वानों ने विस्तार से दे दिया है। कुछ रिवायतों में जो ऊपर से विरोधाभास दिखता है, और जिनके कारण कुछ लोगों ने निकाह और रुखसती के समय में अंतर बताया है, वे भी बहुत मजबूत नहीं हैं, क्योंकि उनके तर्क बहुत प्रबल नहीं हैं। कुछ लोगों ने हज़रत आयशा की रिवायत को इसलिए स्वीकार करने से इनकार किया है, क्योंकि उनके विचार में यह उम्र निकाह या रुखसती के लिए उपयुक्त नहीं है, और उन्होंने हज़रत आयशा के कथन को इस आधार पर लिया है कि उन्होंने अपनी उम्र बताने में भूल कर दी होगी। कुछ लोगों ने अपनी बात को बल देने के लिए यहाँ तक कह दिया कि हज़रत आयशा ने अपनी उम्र बताते समय &#8220;दहाई&#8221; को छोड़ दिया और केवल &#8220;इकाई&#8221; का उल्लेख किया।</p><p>हालांकि, एक बात स्पष्ट है कि हदीस के विद्वानों (ऐमहा-ए-रिजाल) ने जो सिद्धांत और नियम निर्धारित किए हैं, और जिनके आधार पर रिवायतों और उनकी सनद को स्वीकार किया जाता है, उन्हें ध्यान में रखते हुए यह समझना आसान है कि इतने महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में हदीस के विद्वानों की बड़ी जमात गलती पर नहीं हो सकती। दूसरी बात यह है कि यदि हज़रत आयशा की हदीस को भूल पर आधारित माना जाए, तो इससे उनकी अन्य रिवायतों पर आपत्ति उठाने वालों के लिए ऐसा रास्ता खुल जाएगा, जिसे बंद करने का कोई उपाय नहीं होगा।</p><p>हदीस के विद्वानों और इस्लामी विद्वानों की यह विशेषता रही है कि उन्होंने सत्य को बताने और सत्य की प्रचार में कभी कोताही नहीं की। यही कारण है कि खलीफा-ए-वक्त हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से उनके भाषण के दौरान एक साधारण मुसलमान सवाल-जवाब करने की हिम्मत करता है, और हज़रत उमर उन्हें संतुष्ट करने वाला जवाब देते हैं। इसके अलावा, जब हज़रत उमर ने अपने खलीफा के दौर में महिलाओं के लिए मेहर निर्धारित करने का प्रस्ताव रखा, तो खलीफा होने के बावजूद उनकी राय का विरोध किया गया, और उन्होंने अपना फैसला वापस ले लिया। ऐसी एक नहीं, बल्कि अनगिनत मिसालें इस्लामी इतिहास में मौजूद हैं।</p><p>नबवी के दसवें वर्ष को इस्लामी इतिहास में “आमुल-हुज़्न” (दुख का वर्ष) कहा जाता है, क्योंकि इस वर्ष रसूलुल्लाह ﷺ को लगातार दो बड़े और गहरे सदमों का सामना करना पड़ा था।</p><p>पहला सदमा था — आपके प्यारे और सहायक चाचा हज़रत अबू तालिब की मृत्यु। और दूसरा आपकी नेक, सच्ची, सहानुभूति रखने वाली और अत्यंत प्रिय पत्नी हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के देहांत का।</p><p>इन दोनों दुखद घटनाओं ने आप ﷺ के दिल पर गहरा असर छोड़ा। एक तरफ़ इस्लाम के प्रचार और प्रसार की भारी ज़िम्मेदारी थी, और दूसरी तरफ़ घर के छोटे बच्चों की देखभाल की चिंता।</p><p>इसी कठिन परिस्थिति में सबसे पहले हज़रत ख़ौला बिन्त हकीम (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने रसूलुल्लाह ﷺ को निकाह का मशवरा दिया। उन्होंने एक नहीं, बल्कि दो निकाह का सुझाव दिया — एक हज़रत सौदा बिन्त ज़मआ (रज़ियल्लाहु अन्हा) से, और दूसरी हज़रत आयशा बिन्त अबू बकर (रज़ियल्लाहु अन्हा) से।</p><p>हज़रत सौदा बिन्त ज़मआ (रज़ियल्लाहु अन्हा) इस्लाम स्वीकार करने वाली शुरुआती, नेक और निष्ठावान महिलाओं में से थीं। उनके पति भी मुसलमान थे, लेकिन जल्द ही बारगाह-ए-इलाही में बुला लिए गए (यानी उनका निधन हो गया)।</p><p>रसूलुल्लाह ﷺ ने उनसे निकाह फ़रमाया। क्योंकि वे उम्र में वरिष्ठ, बुद्धिमान और अनुभवी थीं, इसलिए निकाह के बाद घर के बच्चों की देखभाल और परवरिश की ज़िम्मेदारी उन्होंने बड़े स्नेह और जिम्मेदारी से निभाई।</p><p>इस प्रकार, उन्होंने न केवल एक माँ का किरदार अदा किया, बल्कि कठिन समय में नबी ﷺ के घर की व्यवस्था और सुकून को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई।</p><p>आप ﷺ ने तीसरा निकाह हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से फ़रमाया, और इस निकाह का मशवरा भी हज़रत ख़ौला बिन्त हकीम (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने ही दिया था, जैसा कि पहले ज़िक्र आ चुका है।</p><p>हालाँकि, हज़रत अबू बकर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने पहले हज़रत आयशा (रज़ि.) का रिश्ता मतअम बिन अदी के बेटे से तय किया हुआ था, लेकिन जब नबी करीम ﷺ की बात आई, तो उन्होंने बिना किसी झिझक के हज़रत आयशा (रज़ि.) को आपके निकाह में देने को प्राथमिकता दी।</p><p>जहाँ तक हज़रत अबू बकर (रज़ि.) के इस कथन का संबंध है —“هَلْ تَصْلُحُ لَهُ؟ إِنَّمَا هِيَ ابْنَةُ أَخِيهِ” (“क्या यह उनके लिए उचित होगा? आखिर वह तो उनके भाई की बेटी है।”) यह बात उन्होंने केवल आप ﷺ के साथ अपनी गहरी दोस्ती, रफ़ाक़त और निकटता की भावना के तहत कही थी — न कि किसी शरीअती रुकावट के कारण। नबी ﷺ और हज़रत अबू बकर (रज़ि.) के बीच ऐसा कोई रक्त संबंध नहीं था जो निकाह के लिए बाधक हो। बल्कि इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि हज़रत अबू बकर ने यह बात अपनी आत्मीयता और स्नेहपूर्ण संबंध के आधार पर कही थी, न कि हज़रत आयशा (रज़ि.) की उम्र को लेकर।</p><p>कुछ लोगों ने यह आपत्ति उठाई है कि यदि हज़रत आयशा (रज़ि.) मात्र छह या सात वर्ष की थीं, तो उनका रिश्ता पहले से कैसे तय किया जा सकता था, जबकि यह उम्र तो ऐसी नहीं होती कि माता-पिता विवाह की चिंता करें। इस बारे में यदि अरब समाज की ऐतिहासिक परंपराओं को देखा जाए, तो यह बात स्पष्ट होती है कि उस दौर में कम उम्र में रिश्ते तय करना एक आम सामाजिक प्रथा थी।</p><p>इतिहास में ऐसी कई मिसालें मिलती हैं, जहाँ छोटी उम्र की बेटियों के विवाह या रिश्ते तय किए गए।</p><p>यह केवल अरब तक सीमित नहीं था — हमारे अपने देश भारत में भी आज तक कुछ क्षेत्रों में ऐसा रिवाज़ पाया जाता है, जहाँ कम उम्र में रिश्ते तय कर दिए जाते हैं, बल्कि कई बार धार्मिक रीति के अनुसार विवाह भी सम्पन्न हो जाते हैं।</p><p>इसलिए यह कहना कि हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का निकाह छह वर्ष की उम्र में नबी करीम ﷺ से होना “ख़िलाफ़े अक़्ल” (अविवेकी) या “ख़िलाफ़े क़ियास” (असामान्य) था — यह विचार तर्कसंगत नहीं है।</p><p>क्योंकि अगर वाक़ई ऐसा कोई असामान्य या समाज-विरोधी कार्य हुआ होता, तो उस दौर में जब पूरा मक्का नबी ﷺ के विरोध में था और आपको बदनाम करने के हर संभव प्रयास किए जा रहे थे — ऐसा नहीं हो सकता था कि मक्कावाले इस कार्य पर चुप रहते।</p><p>जबकि हम देखते हैं कि हिजरत के बाद जब आप ﷺ ने हज़रत ज़ैनब बिन्त जह्श (रज़ियल्लाहु अन्हा) से निकाह फ़रमाया — जो पहले हज़रत ज़ैद (रज़ि.) की पत्नी थीं और ज़ैद आपके मुतबन्ना (दत्तक पुत्र) थे — तो केवल इसी कारण से अरब समाज ने इसे आलोचना और ताने का विषय बना लिया।</p><p>उस पर अल्लाह तआला ने सूरह अल-अहज़ाब में स्पष्ट रूप से मुतबन्ना (दत्तक पुत्र) के अधिकारों और वास्तविक नियमों को बयान करके इस भ्रांति को दूर किया।</p><p>इससे यह बात भी स्पष्ट होती है कि यदि हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के निकाह में कोई असामान्यता होती, तो मक्कावाले निश्चित ही इसे मुद्दा बनाते — लेकिन ऐसा कहीं नहीं हुआ, जो इस बात का प्रमाण है कि यह निकाह समाज और परंपरा दोनों के अनुरूप था।</p><p>अक्सर यह प्रश्न उठाया जाता है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से इतनी कम उम्र में निकाह क्यों किया? आख़िर इस निकाह के पीछे क्या उद्देश्य और क्या हिकमत (दूरदर्शी कारण) थी?</p><p>सामान्यतः यह कहा जाता है कि हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के स्वर्गवास के पश्चात नबी ﷺ को एक जीवनसाथी की आवश्यकता थी—ऐसी नेक, बुद्धिमती और दीनदार महिला जो न केवल गृह-व्यवस्था संभाल सके, बल्कि बच्चों की परवरिश करे तथा नबी ﷺ को मानसिक सुकून प्रदान करे और इस्लाम के मिशन में सहयोगिनी बने। लेकिन आपत्ति करने वाले यह कहते हैं कि जिस आयु में हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का निकाह हुआ, उस अवस्था में तो इन भारी ज़िम्मेदारियों को निभाना असंभव था। वस्तुतः यह आपत्ति निकाह के असली मक़सद को ठीक से न समझ पाने से उत्पन्न होती है।कुछ लोग यह दलील पेश करते हैं कि यदि निकाह का उद्देश्य केवल रफ़ाक़त (साथ), गृह-व्यवस्था या बच्चों की परवरिश होता, तो हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की आयु छह वर्ष नहीं, बल्कि सोलह वर्ष माननी चाहिए थी।</p><p>इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों ने यह दावा भी किया है कि जिस हदीस में हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने अपनी आयु का उल्लेख किया, उसमें उन्होंने “दहाई” (दस का अंक) छिपा दिया और केवल “इकाई” (एक का अंक) का ज़िक्र किया।</p><p>किंतु प्रथमतः तो यह विचारणीय है कि किसी भी भाषा या रिवाज में ऐसा संभव नहीं कि “दहाई” को छोड़कर केवल “इकाई” बताई जाए। और यदि यह मान भी लिया जाए कि उन्होंने “दहाई” को छिपाया था, तो प्रश्न यह उठता है—सोलह वर्ष ही क्यों? इसे छब्बीस या छत्तीस वर्ष भी समझा जा सकता है! फिर यदि सोलह वर्ष की आयु को ही स्वीकार किया जाए, तो यह विचारणीय है कि तीन वर्षों तक रुख़्सती (विदाई) क्यों टाली गई? क्योंकि यदि हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) वयस्क थीं, तो निकाह के तुरंत बाद रुख़्सती हो जानी चाहिए थी।</p><p>अतः यह तर्क न केवल अतार्किक है, बल्कि ऐतिहासिक प्रमाणों के भी विपरीत है। वास्तव में, नबी ﷺ का हर कार्य अल्लाह की हिकमत, समाज की भलाई और इस्लाम की तकमील (पूर्णता) के सिद्धांतों पर आधारित था— और हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से आपका निकाह भी केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि दैवी (इलाही) योजना और धार्मिक उद्देश्य का हिस्सा था।</p><p>दूसरी बात यह है कि हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से विवाह किस उद्देश्य के तहत किया गया। वास्तव में जब हम अपने मन व मस्तिष्क के तराजू पर हर वस्तु को तौलने की चेष्टा करते हैं, तो इसमें त्रुटियों का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। आप ﷺ ने हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से विवाह उस समय किया जब आपके ﷺ घर में सभी प्रकार की ज़िम्मेदारियों के लिए हज़रत सौदा बिंत ज़मआ (रज़ियल्लाहु अन्हा) उपस्थित थीं। अतः इन ज़िम्मेदारियों को उद्देश्य बनाना या उन पर आग्रह करना पूर्णतः तर्क-विरुद्ध है।</p><p>हज़रत आयशा से विवाह की सबसे बड़ी वजह धार्मिक ज्ञान की प्रसार थी। क्योंकि:</p><ul><li>हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का जन्म ऐसे समय में हुआ जब उनके माता-पिता दोनों मुसलमान थे।</li><li>बचपन से इस्लामी वातावरण में पली-बढ़ीं।</li><li>हज़रत अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने इस्लाम और आप ﷺ के लिए जो बलिदान दिए, वह सब उनके सामने थे।</li><li>उन्होंने अपने घर के हर सदस्य को इस्लाम और पैगंबर-ए-इस्लाम के लिए प्राण न्योछावर करते देखा।</li><li>ऐसे स्वच्छ, शुद्ध धार्मिक वातावरण में उनकी परवरिश हो रही थी।</li></ul><p>इसमें और अधिक चमक प्रदान करने के लिए आप ﷺ ने उन्हें बाल्यावस्था में ही अपने घर बुला लिया ताकि:</p><ul><li>इस्लामी शिक्षाओं में और अधिक दृढ़ता आए,</li><li>और उनके माध्यम से विशेष रूप से महिलाओं तक इस्लामी शिक्षाएँ पहुँच सकें।</li></ul><p>और हुआ भी यही! हम देखते हैं कि हज़रत आयशा का ज्ञान उम्मत के लिए कितना लाभकारी और उपयोगी सिद्ध हुआ:</p><ul><li>दो हज़ार से अधिक हदीसें उनसे वर्णित हैं।</li><li>असंख्य सहाबा किराम और ताबेईन उनके ज्ञान से लाभान्वित हुए।</li></ul><p>हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का जिस वातावरण में पालन-पोषण हुआ, वह पूर्णतः धार्मिक था। फिर नबी करीम ﷺ ने उनके सीखने-सिखाने की विशेष व्यवस्था की। इसके अतिरिक्त, स्वयं हज़रत आयशा में ज्ञान प्राप्ति का उत्साह अत्यधिक था। असंख्य हदीसें इसकी साक्षी हैं कि वे रातों को जागकर और दिन में निरंतर आप ﷺ से सीखने का प्रयास करती थीं, और हर विषय की स्पष्टता के लिए प्रश्न करती रहती थीं।</p><p>बाद के दौर में जिन लोगों ने हज़रत आयशा (रज़ि.) की उम्र में मतभेद किया या इस मामले में शक में पड़ गए, वे सब विरोधियों के सवालों से बचने के लिए था। हालाँकि अगर हज़रत आयशा के निकाह या रुख़्सती की उम्र उस ज़माने के रिवाज के खिलाफ़ होती, तो यह मुमकिन न था कि इस्लाम के दुश्मन नबी ﷺ पर हमला न करते। इसलिए यही बात सच्ची और सही है कि हज़रत आयशा का निकाह ६ साल की उम्र में हुआ और रुख़्सती ३ साल बाद, ९ साल की उम्र में हुई।</p><p>हर बात में और इस्लाम के हर काम को दिमाग़ से साबित करने के लिए माफ़ी माँगने वाला लहजा अपनाना और बचाव की मुद्रा में आना – यह सिर्फ़ फ़ायदे के खिलाफ़ नहीं, बल्कि सच्चाई से भागना भी है। इस्लाम बिल्कुल साफ़ दीन है। और पैगंबर-ए-इस्लाम (ﷺ) इंसानी इतिहास के पहले इंसान हैं जिनके हर पल को उनके मानने वालों ने सुरक्षित रखा। इस्लाम कोई कहानी या मिथक वाला दीन नहीं कि हमें पूरी ताक़त लगानी पड़े और फिर भी साबित न कर सकें। इस्लाम ज़िंदा दीन है और इसकी शिक्षाएँ क़यामत तक आने वाले हर इंसान के लिए एक समान फ़ायदेमंद हैं।</p>								</div>
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